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गुरुवार, 12 सितंबर 2013

झन रेंगे कर

आत्माराम कोशा अमात्य
झन रेंगे कर इतरा के रदï्दा बाट म,
साधु - महात्मा नइ राहय बजार - हाट म।
अन्न खाथे, सब ह, निसा लगथे,
एको दिन जात रहिबे लुआट म।
झन रेंगे कर इतरा के रदï्दा बाट म,
साधु - महात्मा नइ राहय बजार - हाट म।
बने अस तंय सुन्दर, बने कस रहा,
अपन संस्कार म तंय, सने कस रहा।
बिसरे दे अगर कोई मरजाद ल,
पछताबे तंय जिनगी भर ये साद ल।
रहि जाबे तंय कहिंचो न घर के न घाट म।
झन रेंगे कर इतरा के रदï्दा बाट म,
साधु - महात्मा नइ राहय बजार - हाट म।
जम के जलवा देखाना, का बने बात ये ?
ककरो जीव ल जराना का बने बात ये ?
आदमी आवय कोनो देवता तो नही,
तोर देखना कोई नेवता तो नही।
भरमा जाथे मनखे तोर इही ठाठ म।
झन रेंगे कर इतरा के रदï्दा बाट म,
साधु - महात्मा नइ राहय बजार - हाट म।
तोर चीज ए त कइसे लूटा देबे का ?
उमर परबज के रिन ल छुटा देबे का ?
कइसे मिहनत ले कइसे ये अदप ल गढ़े,
ऐकरे सेती हम कहिलावत हन सबले बड़े।
रूतो देबे का पानी पुरखा के पाठ म।
झन रेंगे कर इतरा के रदï्दा बाट म,
साधु - महात्मा नइ राहय बजार - हाट म।

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