इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

झन रेंगे कर

आत्माराम कोशा अमात्य
झन रेंगे कर इतरा के रदï्दा बाट म,
साधु - महात्मा नइ राहय बजार - हाट म।
अन्न खाथे, सब ह, निसा लगथे,
एको दिन जात रहिबे लुआट म।
झन रेंगे कर इतरा के रदï्दा बाट म,
साधु - महात्मा नइ राहय बजार - हाट म।
बने अस तंय सुन्दर, बने कस रहा,
अपन संस्कार म तंय, सने कस रहा।
बिसरे दे अगर कोई मरजाद ल,
पछताबे तंय जिनगी भर ये साद ल।
रहि जाबे तंय कहिंचो न घर के न घाट म।
झन रेंगे कर इतरा के रदï्दा बाट म,
साधु - महात्मा नइ राहय बजार - हाट म।
जम के जलवा देखाना, का बने बात ये ?
ककरो जीव ल जराना का बने बात ये ?
आदमी आवय कोनो देवता तो नही,
तोर देखना कोई नेवता तो नही।
भरमा जाथे मनखे तोर इही ठाठ म।
झन रेंगे कर इतरा के रदï्दा बाट म,
साधु - महात्मा नइ राहय बजार - हाट म।
तोर चीज ए त कइसे लूटा देबे का ?
उमर परबज के रिन ल छुटा देबे का ?
कइसे मिहनत ले कइसे ये अदप ल गढ़े,
ऐकरे सेती हम कहिलावत हन सबले बड़े।
रूतो देबे का पानी पुरखा के पाठ म।
झन रेंगे कर इतरा के रदï्दा बाट म,
साधु - महात्मा नइ राहय बजार - हाट म।

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