इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

झन रेंगे कर

आत्माराम कोशा अमात्य
झन रेंगे कर इतरा के रदï्दा बाट म,
साधु - महात्मा नइ राहय बजार - हाट म।
अन्न खाथे, सब ह, निसा लगथे,
एको दिन जात रहिबे लुआट म।
झन रेंगे कर इतरा के रदï्दा बाट म,
साधु - महात्मा नइ राहय बजार - हाट म।
बने अस तंय सुन्दर, बने कस रहा,
अपन संस्कार म तंय, सने कस रहा।
बिसरे दे अगर कोई मरजाद ल,
पछताबे तंय जिनगी भर ये साद ल।
रहि जाबे तंय कहिंचो न घर के न घाट म।
झन रेंगे कर इतरा के रदï्दा बाट म,
साधु - महात्मा नइ राहय बजार - हाट म।
जम के जलवा देखाना, का बने बात ये ?
ककरो जीव ल जराना का बने बात ये ?
आदमी आवय कोनो देवता तो नही,
तोर देखना कोई नेवता तो नही।
भरमा जाथे मनखे तोर इही ठाठ म।
झन रेंगे कर इतरा के रदï्दा बाट म,
साधु - महात्मा नइ राहय बजार - हाट म।
तोर चीज ए त कइसे लूटा देबे का ?
उमर परबज के रिन ल छुटा देबे का ?
कइसे मिहनत ले कइसे ये अदप ल गढ़े,
ऐकरे सेती हम कहिलावत हन सबले बड़े।
रूतो देबे का पानी पुरखा के पाठ म।
झन रेंगे कर इतरा के रदï्दा बाट म,
साधु - महात्मा नइ राहय बजार - हाट म।

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