इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

धोखा

नूतन प्रसाद
उसकी तीव्र इच्छा थी कि नेता बने लेकिन मतदाताओं को उ„ू नहीं बना पाया तो अभिनेता बन गया.सदा से वह डरपोक रहा इसलिए जोखिम भरा काय र् डुप्लीकेट  को थमा देता और सरल काय र् करने का समय  आया तो स्वयं का सीना अड़ा देता.जैसे शेर से मुकाबला करने के वI  डुप्लीकेट को धकेल देता.जब शेर हो जाता ढ़ेर तो उसकी मूंछें उखाड़ने खुद धमक जाता.दशर्क दाद देते कि अभिनेता तो सवा शेर है.इधर डुप्लीकेट परेशान था कि  मेहनत करती है मुगीर् मगर  फकीर अंडे खा कर शरीर बना रहा है.आखिर एक दिन सुअवसर उसके हाथ आया.हुआ य ह कि अभिनेता के पारिश्रमिक के दस लाख रूपये उसके हाथ पड़ गये.अभिनेता दौड़ा आया.उसके चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थी.उसने कहा - धोखा हो गया.निमार्ता ने रूपये मेरे पास भेजे थे लेकिन उनके पी.ए. ने तुम्हें दे दिये.लाओ,वापस करो.डुप्लीकेट ने कहा - धोखा कब नहीं हुआ.फिल्मों मे पहाड़ से छलांग लगाते तुम दिखते हो पर वास्तव में होता हूं मैं.फिल्म क्षेत्र में धोखा का नाम ही तो विश्वास है.
टे ढ़ी ऊंगली से घी नही निकली तो अभिनेता ने चालाकी च ली.कहा - मूरख, य दि डाकू रूपये उड़ा गये या आय कर की च Oी में पीस गये तो बेमौत नहीं मरोगे ! मुKत में खतरा मोल यिों लेते हो ! रूपये इधर फेंकों ।
मजबुरी 
सम्पादक ने पत्रकार से पूछा- कहो,आज का समाचार ?
पत्रकार ने कहा - सब ठीक ठाक है. कहीं से बुरी खबर नहीं मिली
- यिा हत्या, डकैती कुछ भी नहीं ?
- बिल्कुल नहीं । औ तो और पाकिटमारी तक नहीं.
- तो भी लिखो कि जहरीली शराब पीने से दो सौ लोगों की मृत्यु.बम विस्फोट से संसद भवन ध्वस्त ....।
- लेकिन ये तो झूठे होंगे .
- होने दो, हमें पाठकों की रूचि यो का ध्यान रखना है.य दि विस्फोटक समाचार न दे तो अखबार कोई खरीदेगा ?   
डु प्लीकेट ने कहा - जनाब, खतरों से अपुन को कोई खतरा नहीं .खतरे उठाने का धंधा ही पुराना है.एक खतरा और सही....।
इतना कह डुप्लीकेट रूपयों को पचा गया.
आलोचना बनाम स्‍तुति
आप क्रान्तिकुमार से परिचि त है.नहीं तो जान लीजिए कि ये वही लेखक हैं जो अनेकों पुरस्कार अपने कबजे में कर चुके है.उनके पुरस्कार हड़पने के भी एक आनंददायि नी कहानी है.वे च चि र्त प्रख्यात कहलाना चाहतेे थे.पर पुरस्कृत हुए बिना उनका नाम जगमग नहीं हो पा रहा था .क्रान्तिकुमार सभी तिकड़म कर चुके थे.पर  पुरस्कार हाथ नहीं आया तो वे मुख्य मंत्री के पास पहुंचे.कारण पड़ने पर  गधे की शरण पर गिरना पड़ता है.फिर तो वे व्ही.पी.आई. थे.मुख्य मंत्री उन्हें देखते ही आग बबूला हो गये - तुम ही हो न जो अंधाधुंध आलोच ना करते हो.अखबारों में मुझ पर कीच ड़ उछालते हो.लेखक की नानी मर  गयी.वे मिमयाये - नहीं सर,मैंने आपकी कभी बुराई नहीं की.
- झूठ बोलते हो ...। मुख्य मंत्री ने अखबारों की प्रतियों को लेखक पर फेंका.अपनी अंधी आंखों से पढ़ लो.इनमें जितने भी मेरे विरूद्ध लेख छपे है.वे तुम्हारे द्वारा ही लिखे गये हैं.
लेखक की गलती पकड़ी गयी थी.उनके मुंह पर ताला पड़ गया.थोड़ी देर बाद बोले- सर, आप भ्रम में न पड़े.मैं आपका विरोधी नहीं अपितु अÛय  भI हूं.आपकी जो खिंचाई करता हूं, दरअसल वह आपकी स्तुति है.- मुझे मत च लाओ ब‚ू ,यिोंकि किसी  की निंदा स्तुति नहीं हो सकती.मुख्य मंत्री ने उबलते हुए कहा.
- मैं सच  कह रहा हूं.आप धमर्धरंधर है इसलिए ज्ञात भी होगा कि भIि के प्रकारों में एक भIि ऐसी भी होती है.जिसमें भI अपने इý का गुणगान या अराधना नहीं करता अपितु उनकी निंदा करता है.जैसे रावण राम को शत्रु भाव से भजता था.स्वयं राम ने कहा भी है - बैर भाव मोहि सुमिरत निसिच र...। तभी तो जब रावण की मृत्यु हुई तो उसकी आत्मा राम में समाहित हो गई.- तो यिा तुम भी...।
- जी हां, मैं भी आपको कटुशबदों के द्वारा ही भजता हूं.
मुख्य मंत्री गद्गद हुए.उनने क्रान्तिकुमार को पुरस्कार देने की घोषणा कर दी.  

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