इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

प्रदर्शनी


- गार्गीशरण मिश्र  'मराल'  -
गुरुदेव ने अपने शिष्यों को एक कथा सुनाते हुए कहा - एक राजा ने अपने राज्य में कला की सार्थकता सिद्ध करने के लिए एक उत्कृष्ट प्रदर्शनी का आयोजन कराया। दूर - दूर से श्रेष्ठ कलाकार अपनी - अपनी कलाकृतियाँ लेकर आये। निर्धारित तिथि एवं समय पर राजा ने उस प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। राज्य के सभी नागरिकों को प्रदर्शनी देखने की राजाज्ञा हुई। सभी नागरिक बड़े चाव से प्रदर्शनी देखने गये। कलाकृतियाँ इतनी अच्छी थीं कि अनेक नागरिक, कलाकारों के मना करने पर भी उन्हें उठा उठाकर अपने घर ले आये। कुछ नागरिक प्रदर्शनी के प्रति उदासीन थे, किन्तु राजाज्ञा का पालन करने के लिए वे प्रदर्शर्नी देखने गये तो सही पर आँखों पर पट्टी बांधकर।
कलाकारों की शिकायत पर राजा को नागरिकों को दंडित कर कलाकारों की कलाकृतियाँ उन्हें वापिस दिलवायीं। आँखों पर पट्टी बाँधकर प्रदर्शनी देखने वाले नागरिक इसलिए खुश थे कि वे राजा के दंड से  बच गये। इस कथा का मर्म समझाते हुए गुरुदेव ने कहा - यह संसार ईश्वर द्वारा लगाई गई एक प्रदर्शनी है ताकि मानव उनकी कलाकृतियों को देखे और आनंदित हो। लेकिन संग्रह कर इन पर अपना अधिकार न जमाये। अन्यथा ईश्वर की आज्ञा से मौत आकर उससे इन्हें छीन लेगी। आँख पर पट्टी बाँधकर प्रदर्शनी देखने वाले वे लोग थे जो इस संसार को मिथ्या समझकर इससे दूर भागना चाहते हैं। यह विचार ईश्वर की प्रदर्शनी का स्वयं ईश्वर का अनादर करनेवाला है। यह संसार मानव की कर्मभूमि भी है। इसमें निष्काम भाव से कर्म करना - परोपकार करना, दीन - दुखियों की सेवा में, प्राणिमात्र के कल्याण में संलग्न होना ही मानव का कर्तव्य है। यही जीवनमुक्ति है, और यही ईश्वर की इच्छा भी।
पति का चुनाव
एक बार कुछ आधुनिक कुमारिकाओं से पूछा गया कि वे अपने लिए कैसा पति चुनना चाहेंगी - विष्णु जैसा, राम जैसा या शिव जैसा। एक कुमारिका ने कहा - विष्णु जैसा तो कतई नहीं। क्योंकि जब देखो तब विष्णु जी शेष शैया पर लेटे हुए लक्ष्मी जी से पैर दबवाते रहते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि वे लक्ष्मी जी को अपने बराबर नहीं छोटा मानते हैं। जबकि आज का सभ्य समाज नर - नारी में कोई भेदभाव नहीं करता, दोनों को समान मानता है। दूसरी कुमारिका ने कहा - बिल्कुल ठीक कहा तुमने। यही स्थिति श्रीराम जी की भी है। उन्होंने निर्षोष सीता को निर्वासित कर दिया और अंत तक उसे स्वीकार नहीं किया। निर्दोष नारी के साथ यह कैसा न्याय है। तीसरी कुमारिका बोली - बात सही है। मेरे विचार में श्रीकृष्ण जी को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि उनकी तो सोलह हजार आठ रानियाँ थीं। ऐसी स्थिति में हम तो भीड़ में खो ही जायेंगे। वर्तमान युग में तो कानूनन कोई व्यक्ति एक से अधिक पत्नियाँ रख ही नहीं सकता। तभी चौथी कुमारिका बोली - लेकिन शिवजी इन सभी दोषों से मुक्त है। वे पार्वती जी को बराबरी का दर्जा देते हैं और वामांग में बैठाते हैं। उन्हें अर्धांगिनी मानते हैं। उनका अर्धनारीश्वर रुप इसका ज्वलंत प्रमाण है।
सहसा सब कुमारिकाएं एक साथ बोल उठी - हम सब शिवजी के समान पति चाहेंगी। 
1436/ सरस्वती कालोनी, चेतीताल वार्ड जबलपुर (म.प्र.)

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