इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 4 सितंबर 2013

सफेद चप्‍पल की कथा

गिरीश बख्शी

बड़ा पढ़ाकू है गौरीशंकर। जाने कहां - कहां से खोज - खोज कर विभिन्न विषयों की किताबें पढ़ता है वह। उसे देखा है अनन्त ने, अनेक बार देखा है। कभी गौरीशंकर डां. राधाकृष्णन की बड़ी भारी पुस्तक भारतीय जीवन दर्शन में खो गया है तो कभी ध्यानस्थ हो गया है किसी विदेशी लेखक की आधुनिक समाज पर विज्ञान के प्रभाव में। आश्चर्य होता अनन्त को इतनी मोटी - मोटी और कठिन - कठिन ग्रंथ वह ध्यान मग्र हो कैसे पढ़ लेता है ? उसे तो चंदा मामा पढ़ते - पढ़ते झुमरासी आने लगती है। आँखों में पानी की छींटे मार मार कर वह फिर पढ़ने की कोशिश करता है पर एक दो पेज के बाद ही कब उसे नींद आ जाती है, पता ही नहीं लगता। उसे क्रोध आता है अपने ऊपर बड़ा क्रोध आता है। आत्म ग्लानि भी होती है। पर क्या करें ? ये जब - तब चुपके से आ जाने वाली चोट्टïी नींद। मन खराब हो जाता। पुस्तक पढ़ने के मामले में वह गौरीशंकर के सामने दो परसेन्ट भी नहीं।
उस दिन उसी पुस्तक रसिक गौरीशंकर को अनन्त ने देखा कि उसे चप्पल लेना आता ही नहीं। हमारे इतने बड़े शहर में जूते - चप्पलों की एक से एक बड़ी - बड़ी दुकाने हैं जहां नई - नई डिजाइनों की कितनी - कितनी आकर्षक, मजबूत चप्पले हैं, पर उसने खरीदी चप्पल सड़क किनारे ठेला लगाये किसी मोची से। और चप्पल भी कैसी, काली नहीं, छुई मिट्टïी जैसे सफेद रंग की मोटी, भद्दी चप्पल। पुस्तक पढ़ने में मात खा जाने वाले अनन्त के मन के किसी कोने में यह खुशी हुई कि वह चप्पल पसन्दगी में गौरीशंकर से कहीं आगे है।
बदसूरत चप्पल को देखते ही अनन्त ने नाक भौ सिकोड़कर कहा - यह कैसी है, ओह, रिक्शावाला छाप। ऐसी बेढंगी चप्पल क्यों ले ली भाई।
गौरीशंकर ने शान से पैर को आगे कर दबंग स्वर में कहा - मजबूत है मजबूत। देखो, कैसा मोटा सोल है। अनन्त मुंह बिचकाकर बोला - ऊंह, क्या मजबूत ? चार महीने चल भी जाय तो राम का नाम लो। और इस भद्दी चप्पल का रंग ऐसा कि मरा हुआ उलटा साँप जैसा। तुम यार, सचमुच कलर ब्लाइन्ड हो। आज समझ में आ गया।
- कलर ब्लाइंड ? एकाएक जोर से हंस पड़ा गौरीशंकर। बोला - अरे भाई, इतने भले, साफ स्वच्छ श्वेत, धवल रंग पसंद करने वाले को कलर ब्लाइंड कहते हो। देखो, तुम खुद देखो अपने आपको। तुम्हारा कुरता पैजामा चक्क सफेद कैसा सुन्दर लग रहा है। इन दिनों तो सफेद रंग ही ...।
चिढ़ उठा अनन्त - पर भैया, हर रंग की अपनी अपनी जगह होती है। देखो, पेड़ हरा ही अच्छा लगता है। नीला आसमान ही मन को मोहता है, लाल नहीं। गुलाब लाल ही भाता है, सफेद नहीं। और चप्पल काली ही शोभा देती है, सफेद नहीं। समझे कुछ कि और समझाऊं ?
गौरीशंकर ताली बजाकर चहक उठा - वाह वाह क्या बात है। क्या बात है अनन्त। तुम बस आज से कविता लिखना शुरू कर दो। सच कहता हूं चांद सूरज जैसे चमक जाओगे।
अनन्त गुस्सा हो गया। तमककर बोला - मजाक छोड़ो, पर मैं कहता हूं तुम्हारी ये बेढंगी चप्पल कोई दो कौड़ी में भी देगा न, तो मैं नहीं लूंगा। मरे हुए उल्टे साँप की चप्पल। क्या उजबक पसंद है तुम्हारी।
गौरीशंकर अब भी मजाक के मूड में था - अरे भाई, ले लेना दो कौड़ी में। अपने किसी नौकर - वौकर को दे देना। बेचारे का भला हो जाएगा। अब तो और गुस्सा गया अनन्त - नौकर, मेरा नौकर, वह तालाब में सना देगा। मेरा नौकर समझदार है, तुम्हारे समान ... अब क्या क हूं ?
गौरीशंकर ने अब शांत स्वर में कहा - एक बार, एक बार जरा इसे पहन कर तो देखो। कितनी आरामदायक, कैसी मुलायम है गद्देदार। ऐसा लगेगा तुम्हें जैसे वाजीदली शाह की कालीन पर चल रहे हो।
गुस्साया अनन्त रूखाई से बोला - पहनने को कहते हो ? अरे, पहनना तो दूर, मैं इस चप्पल की तरफ देख भी नहीं सकता। मुझे उबकाई आती है।
गौरीशंकर ने बड़े स्नेह से अनन्त के कंधे पर हाथ रख कर कहा - अन्नू भाई, ऐसी जिद अच्छी नहीं। दरअसल जिद किसी भी बात की अच्छी नहीं। देखो, इतने बड़े हमारे जीवन में कौन जाने, कब कैसा समय आ जाय। अच्छा छोड़ों जूता - चप्पल की बातें। ये बताओ, तुम अभी जा कहां रहे हो।
अनन्त दुविधा में पड़ गया। क्या बताए ? अभी बताना भी तो ठीक नहीं। काम हो जाने पर बाद में शान और घमण्ड से बढ़ा - चढ़ा कर कहानी जैसी सुनाई जा सकती है पर पहले से अपनी कमजोरी का इजहार करना ठीक नहीं। किसी को भी अपनी कमजोरी का इजहार करना ठीक नहीं। तो अनन्त ने कहा - एक जरूरी काम से जा रहा हूं, पंडितजी के पास। चलूं, जल्दी नहीं तो दूर बर्फानी आश्रम तक घूमने निकल जायेंगे।
गौरीशंकर को जिज्ञासा हुई - वही पंडितजी रामरिख प्रसाद चतुर्वेदी, जिन्होंने तुम्हारी बिट्टïी की शादी का साल, दिशा, वर, घर सब कुण्डली देखकर बता दिया था ?
अनन्त ने स्वीकारा - हां भाई, वही पंडितजी। वे प्रकाण्ड ज्योतिषी है। मुझे उन पर अटूट विश्वास है। तो चलूं, बाद में तुम्हें अपना किस्सा बताऊंगा।
पंडितजी कुरता पहन, छाता हाथ में रख, पहनी पहनने की तैयारी में थे। अनन्त को देख वात्सल्य भाव से मुसकराकर बोले - आओ अनन्त, बहुत दिन में आये। क्या कोई समस्या फिर आ गई ?
पंडितजी ने फिर शब्द पर जोर दिया तो अनन्त को याद आ गई अविकल की बीमारी के दिनों की बातें। बिट्टïी की शादी में शक्ति से जादा काम किया था अविकल ने। खाने - पीने की भी सुध नहीं रहती थी। कई - कई रातों का जागरण हुआ था तो वही हुआ जिसकी उसे आशंका थी। बहिन को बिदा कर वह बिस्तर में पड़ गया। डांक्टर साहब दवा तो दे रहे थे पर वह लग नहीं रही थी। दिनोंदिन कमजोरी बढ़ती जा रही थी। एक दिन अविकल बोल उठा - बाबूजी, मुंह सीठा - सीठा कैसे लगता है। भूख भी नहीं लगती है। कु छ भी खाने का मन नहीं करता। आप पंडितजी को बुलाओ वे सब ठीक कर देंगे। और सचमुच पंडितजी ने आकर विश्वास जगा दिया था अविकल में। सबसे पहले उन्होंने डांक्टर साहब की खूब तारीफ की, उनकी दी हुई दवाई को एकदम ठीक सही बताया। कहा - अविकल, मैं तुम्हें रक्षासूत्र बांधता हूं। मंत्र पढ़कर और तुम दवाओं को जैसे डांक्टर साहब ने कहा है बराबर लो। जब दवा लो, कुछ भी खाओ या पानी पीओ तो स्वास्थ्य मंत्र का पहले जाप करना। स्वास्थ्य मंत्र है - अच्युतानन्त गोविन्द ... फिर तो अविकल रक्षासूत्र को बड़े श्रद्वाभाव से देखता  रक्षासूत्र बंधे हाथ को माथे से लगाता, स्वास्थ्य मंत्र का जाप करता, पूरे विश्वास के साथ दवा खाता और जादू जेसे देखते ही देखते वह स्वस्थ तन्दुरूस्त हो गया था। वह बोल उठा था - पंडितजी की जय हो।
पंडितजी ने फिर ïपूछा - हां, तो कैसे आये अनन्त आज ?
अनन्त सहम कर वर्तमान में आ गया - जी, पंडित जी दो तीन महीनों से मुझे गुस्सा खूब आता है। पत्नी पर, बच्चों पर इतना ही नहीं, चीज सामान पर भी गुस्सा आता है। और कभी - कभी तो अपने आप पर भी फिर भी मैं गुस्सा नहीं छोड़ पाता। क्या करूं, इसीलिए आया था आपके पास ....।
पंडितजी ने मुसकराकर कहा - कहते हैं, गुस्सा आने पर पानी पीलो, गुस्सा शांत।
अनन्त ने सिर हिलाकर कहा - नहीं होता शांत पंडितजी, नहीं होता शांत। अभी कल ही सब्जी जल जाने पर पत्नी पर गुस्साया तो उसने चट गिलास में पानी दे दिया फिर तो मैंने मारे गुस्सा के गिलास को ही पटक दिया तो मटका फूट गया। चारो तरफ पानी पानी हो गया पर मेरा गुस्सा पानी - पानी नहीं हुआ।
पंडित जी उन्मुक्त भाव से हंसने लगे। बोले - तुम्हारा हाथ दिखाओ, दायाँ हाथ।  हां, ये जो अंगूठी पहने हो न, इसका नग निकलवा कर इसमें मोती लगवा लो। मोती,श्वेत, सफेद होती है, जानते हो न। और एक काम करना ... प्रत्येक पूर्णिमा को व्रत रखकर प्रकाशवान चन्द्र देव की पूजा करना, शीतलता, विनम्रता और शांति प्रदान करने के लिए उनका ध्यान करना, उनकी आराधना करना। और हां, उस दिन सफेद वस्त्र, सफेद खाद्य पदार्थ ही लेना। जैसे दूध रोटी, दूध भात,खीर, साबूदाना, चांवल का चीला जो तुम्हें अच्छा लगे फल में केला, मिठाई में नारियल के लड्डïू, रसगुल्ला ... पानी आ गया न। हां, हां, पानी आ गया। मैं तुम्हारे मुंह की हरकत देख समझ गया, खैर ...।
हां तो सफेद चीजों का भोजन और पहरावा ये कुरता पैजामा तो तुम्हारा सफेद है ही, सिर के बाल भी तुम्हारे काफी सफेद हो गये हैं, पर ...।
अचानक पंडितजी नीचे देख कुछ कहने जा रहे थे कि घबराई पंडिताईन तेजी से आई। आते ही बोली - देखो जी, इत्ती देर हो गई। सब बच्चे स्कूल से घर आ गये। पर बब्बू अभी तक ....।
पंडितजी हड़बड़ाकर कह उठा - अरे, अभी तक नहीं आया। साढ़े पाँच हो रहा है। हां, अनन्त तो तुम वैसई करो। मैं चलता हूं। बब्बू कहीं स्कूल ग्राउण्ड में ही तो नहीं रूक गया। पंडितजी सर्र से साइकिल से स्कूल ग्राउण्ड की ओर चले गये। अनन्त धीरे - धीरे आ गया गौरीशंकर के घर। गौरीशंकर चप्पल पहन, झोला रख सब्जी लेने जा रहा था गोलबाजार। अनन्त को देख ठिठक गया। पूछा - काम हो गया अनन्त ?
- हां हो गया, पर एक काम बाकी है ...।
- क्या ? गौरीशंकर उत्सुक हुआ।
अनन्त ने सिर खुजाते हुए अत्यन्त संकोचपूर्वक दबी आवाज से कहा - गौरीभाई, ये सफेद चप्पल तुमने कहां से ली। मुझे भी ऐसई खरीद दो। बस चलो अभी।
भौचक्क गौरीशंकर अवाकï् रह गया।ï
ब्राम्हण पारा
 राजनांदगांव 6छ.ग.8    

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