इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

बुधवार, 11 सितंबर 2013

क्या वास्तव में राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियाँ थम गई है ?

क्या वास्तव में साहित्य की नगरी राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियाँ फीकी पड़ गई है या फिर ऐसा प्रचार उन लोगों द्वारा किया जाता है जिन्हें राजनांदगांव जिले में चल रही  साहित्यिक गतिविधियों का ज्ञान नहीं या फिर किसी के कहने पर इस तरह की खबरें फैलाने की  चेष्ठïा अनावश्यक की जाती  हैं। वास्तव में देखा जाए तो हमें राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियाँ शून्य है या फिर फीकी पड़ गई है इसका मूल्यांकन सिर्फ राजनांदगांव शहर की साहित्यिक गतिविधियों को ही देखकर ही नहीं करना चाहिए वरन हमें राजनांदगांव जिले को देखकर करना चाहिए। इसमें संदेह नहीं कि आज भी राजनांदगांव जिले में कई ऐसी प्रतिभाएं हैं जो न सिर्फ राजनांदगांव जिले या फिर छत्तीसगढ़ प्रदेश तक ही अपनी लेखनी को सीमित रखें है अपितु राष्टï्रीय स्तर पर भी अपनी लेखनी का लोहा मनवा रहे हैं।
राजनांदगांव के कहानीकार शत्रुघनसिंह राजपूत,गिरीश बख्शी,नरेश श्रीवास्तव,कवि एवं गीतकार डां. बहलसिंह पवार,अनिलकांत बख्शी, कृष्णा श्रीवास्तव गुरूजी, वीरेन्द्र बहादुर सिंह,मुन्ना बाबू,आत्माराम कोशा, चन्द्रकुमार जैन,नरेश कुमार वर्मा, शोभा श्रीवास्तव, कुबेरसिंह,खैरागढ़ के डां. जीवन यदु , डां. रमाकांत श्रीवास्तव,महावीर अग्रवाल,संकल्प यदु, भंडारपुर तहसील खैरागढ़ के नूतन प्रसाद,गोपालदास साहू,गंडई के पीसीलाल यादव, छुईखदान के डां. रतन जैन, है वहीं राष्टï्रीय स्तर के समीक्षकों में जय प्रकाश का माना हुआ नाम है, अर्थात ऐसे सैंकडों नाम है जो आज भी राजनांदगांव जिले की शान को साहित्य के क्षेत्र में जीवित रखें हुए हैं मगर दुर्भाग्य ही कहा जाए कि ऐसे रचनाकारों को स्थानीय साहित्यिक गतिविधियों से दूर रखकर छदम लोग सामने आ जाते हैं और ढिंढोरा पिटवा दिया जाता है कि साहित्यकार गजानंद माधव मुक्तिबोध, डां. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी,डां. बल्देव प्रसाद मिश्र की कर्मस्थली राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियां शून्य है।
राजनांदगांव की साहित्यिक  जमीं, साहित्यिक जमीं के रूप में ही बरकरार रहे इस दिशा में हमने भी एक छोटा सा योगदान देने का प्रयास किए हैं। यही कारण है कि त्रैमासिक पत्रिका विचार वीथि का प्रकाशन किया जा रहा है और इस पत्रिका को पूरे प्रदेश में अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। इस पत्रिका में न सिर्फ राजनांदगांव अपितु दुर्ग,रायपुर, महासमुन्द, रायगढ़,जांजगीर चांपा, कवर्धा, जिले के रचनाकार भी अपनी रचनाएं भेज रहे हैं।
अब यह कहने की आवश्यकता नहीं कि राजनांदगांव की साहित्यिक जमीं में पूरी तरह सन्नाटा नहीं है अपितु अब भी यहां साहित्यकार अपना योगदान देने में डंटे हुए हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन रचनाकारों को  स्थानीय कार्यक्रमों में छदम साहित्यकारों से अधिक महत्व दिया जाये।

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