इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

बुधवार, 11 सितंबर 2013

क्या वास्तव में राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियाँ थम गई है ?

क्या वास्तव में साहित्य की नगरी राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियाँ फीकी पड़ गई है या फिर ऐसा प्रचार उन लोगों द्वारा किया जाता है जिन्हें राजनांदगांव जिले में चल रही  साहित्यिक गतिविधियों का ज्ञान नहीं या फिर किसी के कहने पर इस तरह की खबरें फैलाने की  चेष्ठïा अनावश्यक की जाती  हैं। वास्तव में देखा जाए तो हमें राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियाँ शून्य है या फिर फीकी पड़ गई है इसका मूल्यांकन सिर्फ राजनांदगांव शहर की साहित्यिक गतिविधियों को ही देखकर ही नहीं करना चाहिए वरन हमें राजनांदगांव जिले को देखकर करना चाहिए। इसमें संदेह नहीं कि आज भी राजनांदगांव जिले में कई ऐसी प्रतिभाएं हैं जो न सिर्फ राजनांदगांव जिले या फिर छत्तीसगढ़ प्रदेश तक ही अपनी लेखनी को सीमित रखें है अपितु राष्टï्रीय स्तर पर भी अपनी लेखनी का लोहा मनवा रहे हैं।
राजनांदगांव के कहानीकार शत्रुघनसिंह राजपूत,गिरीश बख्शी,नरेश श्रीवास्तव,कवि एवं गीतकार डां. बहलसिंह पवार,अनिलकांत बख्शी, कृष्णा श्रीवास्तव गुरूजी, वीरेन्द्र बहादुर सिंह,मुन्ना बाबू,आत्माराम कोशा, चन्द्रकुमार जैन,नरेश कुमार वर्मा, शोभा श्रीवास्तव, कुबेरसिंह,खैरागढ़ के डां. जीवन यदु , डां. रमाकांत श्रीवास्तव,महावीर अग्रवाल,संकल्प यदु, भंडारपुर तहसील खैरागढ़ के नूतन प्रसाद,गोपालदास साहू,गंडई के पीसीलाल यादव, छुईखदान के डां. रतन जैन, है वहीं राष्टï्रीय स्तर के समीक्षकों में जय प्रकाश का माना हुआ नाम है, अर्थात ऐसे सैंकडों नाम है जो आज भी राजनांदगांव जिले की शान को साहित्य के क्षेत्र में जीवित रखें हुए हैं मगर दुर्भाग्य ही कहा जाए कि ऐसे रचनाकारों को स्थानीय साहित्यिक गतिविधियों से दूर रखकर छदम लोग सामने आ जाते हैं और ढिंढोरा पिटवा दिया जाता है कि साहित्यकार गजानंद माधव मुक्तिबोध, डां. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी,डां. बल्देव प्रसाद मिश्र की कर्मस्थली राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियां शून्य है।
राजनांदगांव की साहित्यिक  जमीं, साहित्यिक जमीं के रूप में ही बरकरार रहे इस दिशा में हमने भी एक छोटा सा योगदान देने का प्रयास किए हैं। यही कारण है कि त्रैमासिक पत्रिका विचार वीथि का प्रकाशन किया जा रहा है और इस पत्रिका को पूरे प्रदेश में अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। इस पत्रिका में न सिर्फ राजनांदगांव अपितु दुर्ग,रायपुर, महासमुन्द, रायगढ़,जांजगीर चांपा, कवर्धा, जिले के रचनाकार भी अपनी रचनाएं भेज रहे हैं।
अब यह कहने की आवश्यकता नहीं कि राजनांदगांव की साहित्यिक जमीं में पूरी तरह सन्नाटा नहीं है अपितु अब भी यहां साहित्यकार अपना योगदान देने में डंटे हुए हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन रचनाकारों को  स्थानीय कार्यक्रमों में छदम साहित्यकारों से अधिक महत्व दिया जाये।

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