इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 4 सितंबर 2013

दीया बार दव

     डां. विमल कुमार पाठक
 दीया बारदव ।
   अंधियारी के कचरा ल
      सफ्फा बहार दव ॥
         दीया बारदव ॥
   बारो महिना बर उजियारी
      ल तियार दव ॥
        दीया बार दव
अब किसान के शोषनकर्ता,अउ व्यापारी ।
मिठलबरा सब चोर,दलालन, भ्रष्टïाचारी ॥
      के आंखी अउ नाक - कान ल
      बने झारदव ।
         दीया बारदव ॥
खेत - खार मं सोन सहीं,जब धान उपजिही ।
गहूं, चना, कुशियार, तिली,ले डोली सजिही ॥
      अनपुन्ना के पूजा कर
      आरती उतार दव ॥
        दीया बारदव ॥
बायो - डी$जल, फल अउ फूल, अउ सब्जी - भाजी ।
 उपजावव भरपूर, रहय, सब घर भर राजी ॥
      साक्षर जम्मों बनव, जनम
      सब झन सुधार लव ।
         दीयाबारलव ॥
बढ़िया उपजय फसल,किसानी पोट्ठ होय जी ।
 झन तो परय अकाल, न कोन्नो गांव रोय जी ॥
      बिमल होय शुभ - लाभ
      जमों ला वो तिहार दव ।
         दीया बारदव ॥
खुर्सीपार जोन - 1 मार्केट,
आई.टी. आई के पीछे,
सेक्टर -11, भिलाई ( छ.ग.)

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