इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

झलमला

पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी
भाभी ने कुछ न कहकर मेरे हाथ पर पांच रूपये रख दिये। मैं कहने लगा - भाभी, क्या तुम्हारे प्रेम का इतना ही मूल्य है ?
भाभी ने हंसकर कहा - तो कितना चाहिए ?
मैंने कहा - कम से कम गिन्नी
भाभी कहने लगी - अच्छा इस पर लिख दो मैं अभी देती हूं।
मैंने तुरंत ही चाकू से मोमबत्ती के टुकड़े पर लिख दिया - मूल्य एक गिन्नी।
कुछ दिनों बाद गिन्नी के खर्च हो जाने पर मैं घटना बिल्कुल भूल गया। आठ वर्ष व्यतीत हो गये। मैं बी. ए. एल. एल. बी. होकर इलाहाबाद से लौटा। घर की वैसी दशा न थी, जैसी आठ वर्ष पहले थी। न भाभी थी और न ही विमला दासी। भाभी हम लोगों को छोड़कर सदा के लिए चली गयी थी। और विमला कटंगी में खेती करती थी।
एक डिबिया थी। मैंने उसे खोलकर एक दिन देखा तो उसमें एक जगह खूब हिफाजत से रेशमी रूमाल में बंधा हुआ कुछ मिला।
- बहन, कहो तो उसमें क्या होगा ?
दीदी ने उत्तर दिया - गहना रहा होगा।
फिर उसने हंसकर कहा - नहीं उसमें एक अधजली मोमबत्ती का टुकड़ा था और उस पर लिखा हुआ था - मूल्य एक गिन्नी।
मैंने रात को ही एक दासी भेजकर वह टुकड़ा मंगा लिया। उस दिन से कुछ खाया पिया न गया।
चुपचाप जेब से मोमबत्ती को निकालकर उसे जलाया और उसे कोने में रख दिया।
कमला ने पूछा - यह क्या है ?
मैंने उत्तर दिया - झलमला ।
कमला कुछ समझ न सकी। मैंने देखा कि थोड़ी देर में मेरे झलमले का क्षुद्र आलोक रात्रि के अंनत अंधकार में विलीन हो गया।  

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