इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

झलमला

पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी
भाभी ने कुछ न कहकर मेरे हाथ पर पांच रूपये रख दिये। मैं कहने लगा - भाभी, क्या तुम्हारे प्रेम का इतना ही मूल्य है ?
भाभी ने हंसकर कहा - तो कितना चाहिए ?
मैंने कहा - कम से कम गिन्नी
भाभी कहने लगी - अच्छा इस पर लिख दो मैं अभी देती हूं।
मैंने तुरंत ही चाकू से मोमबत्ती के टुकड़े पर लिख दिया - मूल्य एक गिन्नी।
कुछ दिनों बाद गिन्नी के खर्च हो जाने पर मैं घटना बिल्कुल भूल गया। आठ वर्ष व्यतीत हो गये। मैं बी. ए. एल. एल. बी. होकर इलाहाबाद से लौटा। घर की वैसी दशा न थी, जैसी आठ वर्ष पहले थी। न भाभी थी और न ही विमला दासी। भाभी हम लोगों को छोड़कर सदा के लिए चली गयी थी। और विमला कटंगी में खेती करती थी।
एक डिबिया थी। मैंने उसे खोलकर एक दिन देखा तो उसमें एक जगह खूब हिफाजत से रेशमी रूमाल में बंधा हुआ कुछ मिला।
- बहन, कहो तो उसमें क्या होगा ?
दीदी ने उत्तर दिया - गहना रहा होगा।
फिर उसने हंसकर कहा - नहीं उसमें एक अधजली मोमबत्ती का टुकड़ा था और उस पर लिखा हुआ था - मूल्य एक गिन्नी।
मैंने रात को ही एक दासी भेजकर वह टुकड़ा मंगा लिया। उस दिन से कुछ खाया पिया न गया।
चुपचाप जेब से मोमबत्ती को निकालकर उसे जलाया और उसे कोने में रख दिया।
कमला ने पूछा - यह क्या है ?
मैंने उत्तर दिया - झलमला ।
कमला कुछ समझ न सकी। मैंने देखा कि थोड़ी देर में मेरे झलमले का क्षुद्र आलोक रात्रि के अंनत अंधकार में विलीन हो गया।  

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