इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

रविवार, 15 सितंबर 2013

रजनी मोरवाल के दो नवगीत

संयम - जाल
पंछी बन उड़ना मैं चाहूँ
संयम - जाल कसे रे !
इच्छाओं का सागर फैला
जीवन के घट - घट में,
प्यासा कैसे फर्क करेगा
पानी औश् पनघट में,
जल बिन मछली ज्यों तरसूँ मैं
सावन अंग डसे रे!
रूप निहारूँ दरपन में या
छबि देखूँ साजन की,
साथी मौन खड़ा है मेरा
बात करूँ क्या मन की,
नागफनी - सी चुभती रातें
बोझिल हुए सवेरे
शब्दों में कह डाली मैंने
व्यथा कथा क्षण - क्षण की,
हाथों की रेखाएँ बाँचूँ
या पोथी जीवन की,
छन्द - छन्द से गीत गूँजते
मन आँगन में मेरे,
झूमती बदली

सावन की रिमझिम में झूमती उमंग
बदली  भी झूम रही बूंदों के संग

खिड़की पर झूल रही जूही की बेल
प्रियतम की आँखों में प्रीति रही खेल
साजन का सजनी पर फैल गया रंग

पुरवाई  आँगन  में  झूम  रही मस्त
आतंकी  भँवरों से  कलियाँ  है त्रस्त
लहरा  के आँचल भी  करता है तंग

सागर  की लहरों पर चढ़ आया  ज्वार
रजनी  भी लूट  रही लहरों  का प्यार
शशि के सम्मोहन का ये कैसा ढंग

पता - सी. 204, संगाथ प्लेटीना साबरमती - गाँधीनगर हाईवे मोटेरा
अहमदबाद - 380 005। दूरभाष 079 - 27700729, मोबा. 09824160612
rajani_morwal@yahoo.com

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