इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

चलते ही जाना है

संतोष प्रधान  कचंदा
बाधाओं को दूर कर, हमें मंजिल पाना है ।
प्रगति के पथ पर , हमें च लते ही जाना है ।।
    बिखरे कांटे राहों में, चाहे लाये बिध्न हजार,
    बांध जंजीर पैरों में, रोके कोई हमारा द्वार ।।
    पर न रूकेंगे राहों में , ये जंजीर तोड़ जाना है ।
    प्रगति के पथ पर हमें च लते ही जाना है ।।
बाधाओं को दूर कर, हमें मंजिल पाना है ।
    बिजली च मके, तड़ित तड़के,घन मेघ घटा घिरे ।
    या प्रलय  तूफान संग, कालगति हिमगिरे ।।
    चाहे जो भी हो जाये,हमें नहीं घबराना है ।
    प्रगति के पथ पर हमें च लते ही जाना है ।।
बाधाओं को दूर कर, हमें मंजिल पाना है ।
    पी मदिरा को खो जाना है,गुम न हो जाये होश ।
    सतत आगे बढ़ने की , ठंडा न हो जाये जोश ।।
    जोश में आ, होश न खोने देना है ।
    प्रगति के पथ पर हमें च लते ही जाना है ।।
बाधाओं को दूर कर, हमें च लते ही जाना है ।
    आगे ही आगे बढ़ना है,रूकना नहीं हर हाल में ।
    फैला च हूं ओर, न फंसना तितलियों के जाल में ।।
    ये माया जाल , हमें नý कर जाना है ।
    प्रगति के पथ पर हमें च लते ही जाना है ।।
बाधाओं को दूर कर हमें च लते ही जाना है ।
मुकाम - कचंदा (राजा) , पो. - झरना
व्हाया - बाराद्वार , जिला - जांजगीर - चांपा

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