इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 4 सितंबर 2013

दो गीतिकाएं - रमेशचन्‍द्र शर्मा ' चन्‍द्र '

रमेश चन्द्र शर्मा ' चन्द्र '     
सूरज का अपमान कर रहे
ढीठ तिमिर का गान कर रहे
नगर - नगर में बसे संपेरे
सर्पों का विषदान कर रहे
बहुत दिनों से हमसे रूठे
हम उनका अभिमान कर रहे
मछली बोली, तट वालों से
देखो, क्या नादान कर रहे ?
देश निकाला देकर सच को
मिथ्या का गुणगान कर रहे
जिनको सौंपा उपवन हमने
आँधी का आव्हान कर रहे
कौन पढ़े अब अच्छी पुस्तक ?
टी. वी. का सम्मान कर रहे
गाँधी बाबा शिष्य तुम्हारे
तुमको ही बलिदान कर रहे
कुँआ हमारे घर आयेगा
प्यासों का आव्हान कर रहे
रात नशीली है
थोड़ी पीली है
बीज अभी रोपो
धरती गीली है
जले, जलाये क्या ?
माचिस सीली है
मन सपने देखे
तबियत ढीली है
सहज नहीं उल्फत
राह कंटीली है
मुद्रायें मोहें
देह लचीली है
रूप सुदर्शन है
दृष्टिï रसीली है
सत्य कहा जब से
नीली पीली है
सरल नहीं मानना
बहुत हठीली है
डी 4, उदय हाउसिंग सोसाइटी, बैजलपुर , अहमदाबाद -380051

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