इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 11 सितंबर 2013

हो गे हे बिहान ..

डां. जीवन यदु
हो गे  हे बिहान, उठ मितान जाग रे ।
तोर हे बंधे सुरुज के संग भाग रे ।


बेर - बेर बेर हार गे गोहार के ।
बेर झन अबेर कर तयँ बेर ढार के ।
चल उठा गुलाल खोर के बहार के ।
भाग ल जगा - जगा रे घर दुवार के ।
बेर - बेर तयँ ये बेर झन तियाग रे ।
तोर हे बँधे सुरूज के संग भाग रे ।


हाँत - बात ल बेहाँत झन करो, मितान ।
ये बिहान ल तो रात झन करो, मितान ।
ढेर ढेरिहा के बात झन करो, मितान ।
घाम कुनकुना हे, तात झन करो, मितान ।
झन लगा मनुख के नाँव मं तय दाग रे ।
तोर हे बँधे सुरूज के संग भाग रे ।


ये समे, समे हा तोर मुँह निहारथे ।
मोर संग चल ग - कहिकें, वो गोहारथे ।
जेन ह समे के गोठ ल बिसारथे ।
तेन ल समे ह फँून के निमारथे ।
गा समे के राग मं समे के फाग रे ।
तोर ह बँधे सुरूज के संग भाग रे ।
गीतिका
दाऊ चौरा, खैरागढ़
जिला - राजनांदगांव ( छ.ग.)

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