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इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

बुधवार, 11 सितंबर 2013

हो गे हे बिहान ..

डां. जीवन यदु
हो गे  हे बिहान, उठ मितान जाग रे ।
तोर हे बंधे सुरुज के संग भाग रे ।


बेर - बेर बेर हार गे गोहार के ।
बेर झन अबेर कर तयँ बेर ढार के ।
चल उठा गुलाल खोर के बहार के ।
भाग ल जगा - जगा रे घर दुवार के ।
बेर - बेर तयँ ये बेर झन तियाग रे ।
तोर हे बँधे सुरूज के संग भाग रे ।


हाँत - बात ल बेहाँत झन करो, मितान ।
ये बिहान ल तो रात झन करो, मितान ।
ढेर ढेरिहा के बात झन करो, मितान ।
घाम कुनकुना हे, तात झन करो, मितान ।
झन लगा मनुख के नाँव मं तय दाग रे ।
तोर हे बँधे सुरूज के संग भाग रे ।


ये समे, समे हा तोर मुँह निहारथे ।
मोर संग चल ग - कहिकें, वो गोहारथे ।
जेन ह समे के गोठ ल बिसारथे ।
तेन ल समे ह फँून के निमारथे ।
गा समे के राग मं समे के फाग रे ।
तोर ह बँधे सुरूज के संग भाग रे ।
गीतिका
दाऊ चौरा, खैरागढ़
जिला - राजनांदगांव ( छ.ग.)

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