इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 11 सितंबर 2013

होली है ... ।

होली है ... ।
संतोष प्रधान ' कचंदा'
झांझ - नगाड़े बज उठे, भींगे रंगों में चोली है।
गुंजे - गुंजन चहंू ओर, होली है भई होली है॥

पुष्पे पलाश आम्रद्रुम, बहे बसंती बयार,
धरा हरित पट ओढ़, रूप लिया निखार।
अंबर ने भी धारण किया, रंगों की रंगोली है।
गुंजे - गुंजन चहूं ओर, होली है भई होली है॥

गगन लगे मन भावन, आया बसंत बहार,
लाया रंग मस्ती भरी, होली का त्योहार।
फागुन की पावन पर्व ने, मन में मधुरस घोली है।
गुंजे - गुंजन चहूं ओर, होली है भई होली है॥

उल्लास उमंग की उर्मि उठी, अंतर उर में,
बजे नगाड़े, रंग बरसे, सारे गांव व पुर में।
ढोल नगाड़े गीतों की सबकी अपनी बोली है।
गुंजे - गुंज चहूं ओर, होली है भई होली है॥

अबीर उड़े आकाश में, गजब रंग छाये,
नाचे गाये, मौज मनाए, फगुवा गीत गाये।
रंग गुलाल लगाते, कहते सबको होली है।
गुंजे - गुंजन चहूं ओर, होली है भई होली है॥

बच्चे - बूढ़े जवान, सभी हुए मदमस्त,
होली की हुड़दंग में, भाग लिए समस्त।
बालक वृद्ध जवानों की, जाने कितनी टोली है।
गुंजे - गुंजन चहूं ओर, होली है भई होली है॥
मु. - कचंदा राजा
पो. - झरना,व्हाया - बाराद्वार
जिला - जांजगीर - चांपा  ( छ.ग.)

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