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बुधवार, 4 सितंबर 2013

प्रेम नदी की धार

हरगोविन्द पुरी
खुले चिड़ियों के पर, गाओ झरनों के संग।
बहो नदी की धार, रहो हवाओं के संग।।
        प्रेम क्षितिज के पार
सुनो घुॅंघरू का गीत, झूमों पत्तों की डाल।
नाचो चन्द्रिका की रात, उड़ो जुगनुओं की चाल।।
        प्रेम - सुरभि की यार।
बाँधों पैरो में जोति, करो अर्पन स्वप्रीति।
डोरे नयनों के डाल, रंगों स्नेह की रीति।।
        उठो प्रेम की बयार।
बिखरे कुन्तल सॅंवार, हो मौन भी उधार।
छुओ चिबुक की पोर, बाँह गले में सिधार।।
        प्रेम - शहद की धार।
करो पुलकित खुमारी, उड़े चन्द्रिका फुलवारी।
झिलमिल लहरों का गीत, गाओ मेरे हे मीत।।
        स्नेह मिलन की हार।
दिशायें करती हैं वन्दन, मन महके ज्यों चंदन।
तोड़ सुरों का बन्धन, हो प्रेम का फंदन।।
        उलझो प्रेम की डार।
हार में भी ये जीत, प्रेम की है यह नीत।
गले लग जा मीत, गाये मिलन के गीत।।
        मधुर प्रीति का सार।
छा जायेगी बहार , डालो प्रेम का बंधन।
तोड़ रीति का जान, हो जाये हम नंदन।।
        जुड़ा प्रेम का तार।  

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