इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

नाटक का शेष हिस्सा


डाँ जीवन यदु
सुनें ! सुनें ! भाई - बहन सभी सुनें !
आज इस नुक्‍कड़ पर
हम खेलने जा रहे है एक नाटक
इसलिए आप सभी
कान खोल कर देखें
और आंखें खोलकर सुनें
अपने ही शबदों को आप ही गुनें

सुनें ! सुनें ! सभी जन सुनें
और जो श्रीमन्त है,महा - जन है
जो सचमुच  के नाटकबाज है,सत् - जन हैं
वे न चाहें, तो न सुनें
वे अब तक -
अपनी बंदूकों के लिए
ऐसी गोलियां चुनें
कि जिसकी मार से मारे जा सके शबद ।
और य दि देखना चाहे वे भी
तो अवश्य  देखें,
य दि सुनना चाहें वे भी
तो अवश्य  सुनें
हाथ मलें और सिर धुनें
सुनें ! सुनें ! सुनें ! सभी सुनें ।

हमारे इस नाटक का नाम है -
आदमी की लम्बाई उफर्
एक शबद है आदमी
(यिा बात है कि इस नुOड़ पर
याद आ रहे है सफदर हाशमी)
नाटक का नाम बहुत लम्बा है
बहुत लम्बा है नाटक भी
नाम की लम्बाई पर मत जायें
नाटक को उसकी लम्बाई में देखें
देखें कि कोई आदमी
कितना लम्बा हो सकता है शबदों के साथ
कि उसकी एक घाय ल चीख
सुनी जाती है दूर - दूर तक ।

अभी इस नाटक में
आप देखेंगे कि एक आदमी
पूरी ताÞत से उछाल कर कुछ शबद
आपके बीच  शामिल हो जायेगा
और आप ही में खो जायेगा
आपके अंदर कुछ शबद बो जायेगा
और आप ही में खो जायेगा
अभी वह इस नुOड़ पर मरेगा -
लेकिन हारी - बीमारी से नहीं,
बुढ़ापे की लाचारी से नहीं
वह जब मरेगा
तो इस लम्बे नाटक को
अपनी लम्बाई पर ले जायेगा
अपनी शेष उम्र -
अपने शबदों को दे जायेगा ।

अच्छा तो, अब शुरू कर रहे हैंं खेल
अब तक -
श्रीमंत और महा - जन
समाज के स्वयं - भू कणर्धार
च ढ़ा चुके होंगे अपने छुरों पर धार
कर चुके होंगे अपने गु·डों को तैयार
फूंक चुके होंगे मंत्र - मार - मार - मार
चुन चुके होंगे गोलियां
साफ कर चुकें होंगे बंदूकें
इस बार वे मत चूकें
मार कर बतायें शबदों को

सुनें ! सुनें ! भाई - बहन सभी सुनें ।
सावधान कि कोई गोली
लग सकती है आपको भी
छुरे घुस सकते हैं भुO से
आपकी भूखी अतड़ियों में
सिर पर हो सकते हैं लाठियों से प्रहार
पीठ पर खा सकते है -
नाल ठुंके जूतों की दनाकेदार ठोकर
आपके बीच  से -
कोई भी उठ सकता है
रामपाल होकर ।
सावधान रहें और देखें
कि कोई आदमी
शबदों में कैसे बदलता है
कि एक लोहे का टुकड़ा
जवाबी हमले के लिए
हथियारों में कैसे ढ़लता है ?

जब बंदूक की आवाज
और आदमी की चीख एक साथ सुनें
तो ध्यान रहे -
खतम नहीं समझ लें
पूरा नाटक,सारा किस्सा
कल इसी नुकिड़ पर
फिर खेला जायेगा
इस नाटक का शेष हिस्सा ।

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