इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

डॉ. परदेशीराम वर्मा: लेखक भी एक्टिविस्‍ट भी

गिरीश पंकज 
डां. परदेशीराम वर्मा अभी हुए है साठ के लेकिन च्च्पाठाज्ज् तो वे बहुत पहले ही हो चुके थे। उनका लेखन च्च्पाठत्व ज्ज् को बखूबी सत्यापित करता है। वर्माजी से मेरे दो दशक पुराने संबंध है। विभिन्न अखबारों से जूड़े रहने के कारण और एक लेखक होने के नाते, उनकी रचनाओं को पढ़ने और छापने के अनेक सुअवसर मिले।फिर जब साक्षरता अभियान चरम पर था तब कुछ ऐसे मौके भी आए जब उनके साथ लेखन शिविरों या कार्यशालाओं में भाग लेने का अवसर मिला। भिलाई, कसडोल,जबलपुर,भोपाल से लेक र पंचमढ़ी तक उनका साथ हमेशा सुखद एवं प्रेरक रहा।
नवसाक्षरों के लिए वर्माजी जिन विषयों का चयन करते हैं, वे विषय दूसरों के जेहन में कौंधते ही नहीं। विशुद्घ रूप में माटी से जुड़े विषय। साधारण से दिखने वाले पात्रों को वे महानायक बनाकर पेश कर देते हैं। नवसाक्षरों के लिए उन्होंने छत्तीसगढ़ के जीवंत नायकों की सच्ची कहानियां लिखी। उनक ा लक्ष्य ही यही है कि यहां के सामान्य से सामान्य लोगों के असामान्य कामों से देश के लोग परिचित हो। और वे अपने अभियान में सफल भी हुए हैं। जे.एम.नेल्सन, मिनीमाता से लेकर देवदास बंजारे तक के बारे में लिखकर पूरे देश के पाठकों तक पहुंचाया। अपने मौलिक कृतियों को किनारे करके वर्माजी ने माटी के ऋण से उऋण होने के लिए अपने जीवन के कीमती पल यहां के नायकों को महानायक बनाने में होम कर दिए। यह बहुत बड़ी बात है।
डां परेशीराम वर्मा लेखक कम, एक्टिविस्ट ज्यादा हैं। सही लेखक इसी भूमिका में रहते हैं। एक लेखक वो होता है जो गोष्ठिïयों में चिल्लाकर शंात हो जाता है, दूसरा लेखक वक्त पड़ने पर मशाल लेकर निकल पड़ता है। परदेशीराम दूसरे किस्म के लेखक हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा और उसकी अस्मिता के प्रश्न पर तमाम तरह के आरोपों को झेरने के बावजूद वे भूपेश बघेल विधायक के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते रहे। जबकि उनके पैरों में तकलीफ थी। सबको पता है कि देवदास बंजारे के साथ रायपुर जाते वक्त वे बुरी तरह से दुर्घटनाग्रस्त हो गए थे। बंजारे तो बंजारे निकले। अनंत यात्रा पर निकल पड़े लेकिन वर्माजी को अभी कुछ और अच्छे काम करने थे। उनका एक पैर बुरी तरह घायल हो गया था। वर्माजी की जिजीविषा ही थी कि पैर बच गया। वे महीनों तक बिस्तर में पड़े रहे। पैर के ठीक होने की प्रतीक्षा करते रहे। महीनों बाद जब ले देकर चलने फिरने के लायक हुए तो छत्तीसगढ़ी का झंडा लेकर चल पड़े। इसलिए मैं उन्हें एक्टिविस्ट भी कहता हूं। महीनों तक बिस्तर में पड़े - पड़े वर्मा जी ने इतना लेखन किया, इतना लेखन किया कि लोग दंग रह गये। लेखन के प्रति ऐसी निष्ठïा दुर्लभ है। इतना धुंआधार लिखने वाले वे इकलौता हैं।
परदेशीराम जी बड़े भाई की तरह हैं। उसी तरह वे फटकारते भी हैं और दुलारते भी हैं। मेरे पचासवे वर्ष पर जब सुधीर वर्मा ने च्च् साहित्य वैभवज्ज् के विशेषांक की योजना बनाई तो वर्मा जी ने मुझे समझाया था कि च्च्अंक भले ही निकल जाए इस पर केन्द्रित समारोह भव्य नहीं होना चाहिए। बिलकुल साधारण।ज्ज् मैं उनकी बात से सहमत था। इसलिए मन में कोई इच्छा ही नहीं हुई कि उस विशेषांक के बहाने मुझ पर कोई कार्यक्रम हो। सचमुच, आपके मुंह पर आपकी तारीफ की जा रही हो, यह अजीब किस्म का मामला लगता है। परदेशी जी ने भी कहा था कि मुझ पर भी कोई ग्रन्थ निकले लेकिन मैं अपनी स्तुती वाला कोई कार्यक्रम नहीं होने दूंगा। मैं जानता हूं, ऐसा ही होगा।
परदेशीराम जी बहुत लिखते हैं। मुझसे कई गुना जादा। लेकिन जब कभी छपा देखते हैं तो फोन करके शाबाशी देते हैं कि अच्छा लिखा, बधाई। यह उनका बड़प्पन है। वर्माजी की ऊर्जा देखकर मुझे निरंतर प्रेरणा मिलती है कि इसी तरह सक्रिय रहना है। लेकिन प्रकृति सारे सपने तोड़ देती है। सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाती है। अचानक एक अगस्त को पेट में जानलेवा दर्द हुआ। आपरेशन की नौबत आ गई। गांल ब्लेडर निकालना था। डांक्टर ने पूरी तरह आराम करने कहा है। लेकिन जब पता चला कि वर्माजी के साठ साल पूर्ण होने पर एक ग्रंथ निकल रहा है तो मन नहीं माना। लगा, मुझे भी कुछ न कुछ लिखना ही चाहिए। बहुत कुछ लिखना चाहता हूं। बाद में लिखूंगा भी, मगर फिलहाल इतना ही। पीठ में जकड़न शुरू हो गई है। पेट में खिंचाव सा महसूस कर रहा हूं। लेकिन वर्माजी पर लिखने का हौसला नहीं छोड़ा, क्योंकि इसकी प्रेरणा भी वर्मा जी ही हैं। वर्माजी निरंतर सक्रिय रहें। अपनी कहानियों एवं साहित्येतर लेखन के सहारे वे अपना नाम रोशन करते रहें,छत्तीसगढ़ की यश पताका फहराते रहे .....।

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