इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

रविवार, 15 सितंबर 2013

अशोक अंजुम की दो गज़लें

1

अशोक अंजुम
सहरा, जंगल, पर्वत, पानी !
सबकी  अपनी  रामकहानी!

हैं कबीरपंथी ओहदों पर
थकी-थकी कबिरा की बानी!

ढाई आखर ढूँढ रहे हैं, 
अपने घर का पता, निशानी!

मस्तीए सेक्सए ड्रग्स में डूबी
देश दूंदता फिरे  जवानी !
 
बेटा  सच की राह पे चलना
डैडी ये सब बात पुरानी !

मंहगी दारूए सुन्दर लड़की
बाबू फिर भी आनाकानी !

सारे  ज्ञानी   बाज़ारों  में
बरसे कम्बल, भीगे पानी !
     2 
इधर  ढूँढती है ए उधर ढूँढती है
तुम्हें हर घड़ी ये नज़र  ढूँढती है

कहाँ तक डरोगेए कहाँ तक बचोगे
ये दुनिया है दुनिया खबर ढूँढती है

मेरे कद में मेरा नहीं हाथ कुछ भी
दुआ आज अपना असर ढूँढती है

सुबह जब उड़ी थी यहीं था ठिकाना
हुयी शाम चिड़िया शज़र ढूँढती है

ये लड़की भी क्या शय बनाई है या रब
जनम से मरण तक ये घर ढूँढती है

कहन पर मेरा जोर रहता है अंजुम
तुम्हारी नज़र बस बहर ढूँढती है

पता : संपादक - अभिनव प्रयास त्रैमासिक
ट्रक गैट, अलीगढ़ 202001 (उ.प्र.)
मो09258779744,09358218907

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