इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

रविवार, 15 सितंबर 2013

अशोक अंजुम की दो गज़लें

1

अशोक अंजुम
सहरा, जंगल, पर्वत, पानी !
सबकी  अपनी  रामकहानी!

हैं कबीरपंथी ओहदों पर
थकी-थकी कबिरा की बानी!

ढाई आखर ढूँढ रहे हैं, 
अपने घर का पता, निशानी!

मस्तीए सेक्सए ड्रग्स में डूबी
देश दूंदता फिरे  जवानी !
 
बेटा  सच की राह पे चलना
डैडी ये सब बात पुरानी !

मंहगी दारूए सुन्दर लड़की
बाबू फिर भी आनाकानी !

सारे  ज्ञानी   बाज़ारों  में
बरसे कम्बल, भीगे पानी !
     2 
इधर  ढूँढती है ए उधर ढूँढती है
तुम्हें हर घड़ी ये नज़र  ढूँढती है

कहाँ तक डरोगेए कहाँ तक बचोगे
ये दुनिया है दुनिया खबर ढूँढती है

मेरे कद में मेरा नहीं हाथ कुछ भी
दुआ आज अपना असर ढूँढती है

सुबह जब उड़ी थी यहीं था ठिकाना
हुयी शाम चिड़िया शज़र ढूँढती है

ये लड़की भी क्या शय बनाई है या रब
जनम से मरण तक ये घर ढूँढती है

कहन पर मेरा जोर रहता है अंजुम
तुम्हारी नज़र बस बहर ढूँढती है

पता : संपादक - अभिनव प्रयास त्रैमासिक
ट्रक गैट, अलीगढ़ 202001 (उ.प्र.)
मो09258779744,09358218907

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