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गुरुवार, 12 सितंबर 2013

कविता के लिए जीना और मरना मैंने नायक में देखा

आचार्य सरोज द्विवेदी
कृष्णकुमार नायक अभाव एवं संघर्षों का कवि था। वह तब तक जीवित रहा जब तक अभावों में रहा और जब सुख - सुविधा मिली तो उसने अपने जीवन का त्याग कर दिया।
इस साहित्यिक नगरी में वह धूमकेतु के तरह उभरा और उसी तरह विलीन हो गया। उसकी पैनी दृष्टिï ने नई कविता को अच्छी गति दी। श्री नायक लगभग एक दशक तक खूब लिखता और छपता रहा। इस बीच उसने $ग$जल, नई कविता खूब लिखी। स्व. डां. नन्दूलाल चोटिया न सिर्फ कृष्णकुमार नायक की रचनाओं को अपितु स्व.ï नायक को भी खूब पसंद करते थे। उसने इसी तरह अन्य साहित्यिक लोगों से अच्छा संपर्क बना कर रखा। नई कविता पर उसकी समझ बहुत गहरी थी और दृष्टिï पैनी थी।
1980 में मेरे छत्तीसगढ़ झलक छोड़ने के बाद वह वहां काम पर लगा। पत्रकारिकता में भी उसकी कलम बड़ी तीखी और पैनी थी। कुछ ही वर्षों में उसने इस साहित्यिक नगरी में अपनी अच्छी पहचान बना ली। किन्तु इस बीच उसका जीवन अभावों और कठिन संघर्षों में बीतता रहा। उसकी दिनचर्या लड़खड़ायी हुई थी। कभी - कभी उसे खाने और सोने के भी लाले पड़ते थे किंतु वह अपने निजी मामलों को दबाकर पूरे विश्वास पूर्वक साहित्यिक चर्चा किया करता था। बाद में उसे आदिम जाति कल्याण विभाग में शिक्षक की नौकरी मिली और न जाने क्यो नौकरी में आने के बाद वह सशंकित और भयभीत रहने लगा। साल दो साल की नौकरी में ही स्व. नायक टूट सा गया। और आखिरी के कुछ दिन पूर्व वह अपने मित्रों से जीवन की नीरसता की चर्चा करने लगा। और अचानक एक दिन हमने सुना - नायक नहीं रहे ...। कविता के लिए ही जीना, कविता को सब कुछ समझना और कविता के लिए मरना मैंने नायक में देखा।
ज्योतिष कार्यालय, मेन रोड, तुलसीपुर
राजनांदगांव 6 छग. 8

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