इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

आधारशीला


प्रो. डॉ. जयजयराम आनन्द
जीवन की आधार शिला है
    सचमुच में बचपन
बचपन कोरा कागज जैसा
जो चाहो सो लिख दो
लेकर रंग - बिरंगी कूँची
मनमाने रँग भर दो।
    जग को जैसे भोर मिला है
    घर - घर को बचपन।
बचपन निर्मल - निर्झर जैसा
आता जिसे न थमना
पंख लगाकर आसमान में
आता उसको उड़ना
    चमन में जैसे फूल खिला है
    खिलता है बचपन
बीज पड़ा कीचड़ में जैसे
सरसिज बनकर खिलता
धूल - धूसरित बचपन वैसे
हीरा मोती बनता
    कूल कदम्म बीच खेला है
    गिरधर का बचपन।
आनंद प्रकाशन प्रेम निकेतन
ई 7/70 अशोका सोसाइटी
अरेरा कालोनी, भोपाल  [म.प्र.]

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