इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

आधारशीला


प्रो. डॉ. जयजयराम आनन्द
जीवन की आधार शिला है
    सचमुच में बचपन
बचपन कोरा कागज जैसा
जो चाहो सो लिख दो
लेकर रंग - बिरंगी कूँची
मनमाने रँग भर दो।
    जग को जैसे भोर मिला है
    घर - घर को बचपन।
बचपन निर्मल - निर्झर जैसा
आता जिसे न थमना
पंख लगाकर आसमान में
आता उसको उड़ना
    चमन में जैसे फूल खिला है
    खिलता है बचपन
बीज पड़ा कीचड़ में जैसे
सरसिज बनकर खिलता
धूल - धूसरित बचपन वैसे
हीरा मोती बनता
    कूल कदम्म बीच खेला है
    गिरधर का बचपन।
आनंद प्रकाशन प्रेम निकेतन
ई 7/70 अशोका सोसाइटी
अरेरा कालोनी, भोपाल  [म.प्र.]

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