इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 4 सितंबर 2013

जब तुम्‍हारी जिंदगी

संदीप भारती ' होरी '
जब तुम्हारी जिन्दगी
कोई नाग का वंशज डसे
गीत भर लेना अदिबो उम्र की मधु प्याली में
हर तरह का विष उतर सा जायेगा
ऑसू के संग - संग लहू की लाली में
एक नया आसव स्वत: घुल जायेगा।

जब तुम्हारी जिन्दगी टीसता हुआ कोई घॉव हो
प्यार एक उजड़ा हुआ वीरान कोई गॉव हो
प्यासे होठों पर पड़ा हो आह का सागर
तप रहे सिर से जुदा हो नम्र वक्षस्थल
ढूंढना मेरा पता अक्षर के इस संसार में
दर्द का हर द्वार खुलता जायेगा।

जब तुम्हारी जिन्दगी
भय का नया विस्तार हो
मौत को मजहब बना इंकलाब कर देना
खून की बँूदों पर ताज - ओ - तख्त क्या टिक पायेगा
बौरेगा जन का ह्रïदय फिर प्यार की अमराई में
झूमेगा मन सरसों किसी चाह की फगुनाई में।
विष्णु मंदिर के पीछे,कहरा पारा, जांजगीर,जिला - जांजगीर - चांपा

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