इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 4 सितंबर 2013

कविता क्‍या है

 डाँ. महेन्द्र प्रतापसिंह चौहान
जिसके ऊपर जो भी बीता
जैसा बीता जब भी बीता
का बीता को स‚े दिल से
सबके सम्मुख सहज भाव से
प्रगट कराने बनती कविता ।
जो कुछ कभी न कह सकते है,
कहने में भय  में दिखते हैं,
उसको सबसे मधुर रूप में,
अपनी बात बताती कविता ।
देश कभी भी संकट में हो,
देश की जनता जो व्याकुल हो
सबको हिम्मत दे सुख देने,
सबको एक बनाती कविता ।
कविता सबसे प्रेम कराती
देश प्रेम को पास बुलाती
कितने भी जब दूर रहे तब
उनको पास बुलाती कविता
कविता सबकी, कविता में सब
कविता कहते सुनते भी सब,
सबके दिल को एक बनाती
सबके अन्तर भाव मिटाती कविता ।
सलिया पारा, भानुप्रतापपुर, जिला - को·डा (छ.ग.)

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