इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 4 सितंबर 2013

धरती दाई के कोरा


 गिरधारी लाल चौहान
धरती दाई के कोरा
सुख सुमत के मोरा
नांगर - जांगर सकेलव
अउ हीरा मोती बटोरा ।
ढ़ेला माटी के सेवा
समझव नून बासी मेवा
धिर म हावय  खीर
नई लागे धरे कटोरा ।
कोठी नई छोड़े अढ़िहा
दिन च ल ही बढ़िया - बढ़िया
चि न्ता पेट के नई रही
छूट जाही कनिहा टोरा ।
घर अंगना खोल दुवारी
रूख राई फूल फूलवारी
अपन खातिर लगावा
का रहना पर निहोरा
आस - पड़ोस पहुना पाही
देखा ताका आवा जाही
खाना कमाना रहना बसना
अपनो बर ओसने संजोरा
फुसुन फासन ठेस ठास
होवत रथे नोहे खास
नोहे बुधमानी चुल्हा फोरइ
रोका घर उपजत घर बड़ोरा ।
पोट कमावा, पोट खावा
पहिरा ओढ़ा नाम कमावा
 मानुष तन चार दिनिया
लंदर - फंदर दांत गिजोरा ।
पढ़ा लिखा दुनिया सीखा
करू कस्सा जाना मीठा
एही जनम सबले बड़े
पाकू एकर सब अंजोरा
पड़वाँँ राखव, बइला राखव
गाय  बछरू पोसव पालव
सिरागे च रागन घर म राखा
पाउडर ल झर चि चोरा
नारी पुरूष दुनों कमावा
एक के अकाइस बनावा
ए पुर ओर पुर ल देखा
बात - बात झन ओनहा जोरा ।
ग्राम - छेरकाभाठा, नवापारा खुदर्,
पो. - नन्दौर खुदर्,व्हाया - सिित, जि. - जांजगीर चाम्पा (छ.ग.)

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