इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

रविवार, 15 सितंबर 2013

बस, औरत हूं और कुछ नहीं

शीला डोंगरे
बचपन में जब माँ समझाती
कदम सम्भलकर रखना बेटी
मर्दों की है दुनियां सारी
घर की नीव है, तेरी जिम्मेदारी
मन को पंख ना कभी लगाना
मर्दों से ना टक्कर लेना
माँ कह कह कर थक ही जाती
और मै हंस कर टाल भी देती
लेकिन कल ओ सामने आया
मुझकों उसने आइना दिखाया
मै फूल - कली हूँ भंवरें की जागीर
या हूँ तितली आवारा राहगीर
मै ठिटक गई ये सोंच के पल भर
झांक के देखूं खुद के अंदर
कुछ भी तो साबुत नहीं था
दिल टुकड़ों में बंटा पडा था
औकात मैं आपनी समझ चुकी थी
बस औरत हूँ और कुछ नही थी !!!
पता :अध्यक्ष , अखिल हिंदी साहित्य सभा (अहिसास )
फ्लैट न. डी 4, रोहण परिसर कोआपरेटिव हाऊसिंग सोसाइटी
राणे नगर नासिक पि. न. 422009

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