इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

रविवार, 15 सितंबर 2013

गरजत बरसत ...

रामकुमार साहू ' मयारु '

गरजत बरसत लहुकत हे बादर
आंखी म जइसे आंजे हे काजर
मेचका - झिन्गुरा के गुरतुर बोली
हरियर हरियर, धनहा डोली
बरसे झमाझम, गिरत हे पानी
माते हे किसानी, बइला नांगर
गरजत बरसत लहुकत हे बादर
आंखी म जइसे आंजे हे काजर
सुरूर सुरूर चले पवन पुरवइया
अंगना म फुदरे बाम्भन चिरइया
गली गली बन कुंजन लागे
विधुन होगे एकमन आगर
गरजत बरसत लहुकत हे बादर
आंखी म जइसे आंजे हे काजर
खोर गली म चिखला पानी बोहागे रेला,
कागद के डोंगी बनाय, खेले कोनो घघरइला
सुरुज देवता के परछो नई मिले
कहाँ जाके लुकागे, काबर
गरजत बरसत लहुकत हे बादर
आंखी म जइसे आंजे हे काजर
पता :
ग्राम गिर्रा - पलारी
जिला बलोदा बाजार  (छ .ग .)
9826198219

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें