इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

बुधवार, 11 सितंबर 2013

सूर्योदय

पं. रमाकांत शर्मा
प्रतिदिन के सूर्योदय में होता नव आशा का संचार
क्षुधा संवरण करता मानव, निर्निमेष संसार।

    अरे विश्व तू छलना है, हैं लोग स्वयं पर भार,
    जीत - जीत कर पुन: पुन: हो जाती है हार।

कहीं किसी साहब के कुत्ते, मीठे बिस्कुट खाते हैं,
कहीं किसी के लाड़ले, भूखे ही सो जाते हैं।

    एक मनु के सभी है मानव, सब अवसर से खेल रहे हैं,
    रीति, नीति सिद्धांत नहीं है, लोगों को ठेल रहे हैं।
    इंसानों की मजबूरी को गेंद बनाकर खेल रहे हैं।

ये कैसे अन्याय हो रहा, चुपके - चुपके पर तेजी से,
यहां मचा कुहराम, चतुर्दिक कष्टïों के बादल छाते हैं।

    चलो, चले जाएं साथी, आज नहीं कोई है सुनता,
    चीख - चीख कर क्यों गाल बजाये, आज नहीं है कोई गुनता।
गंगा कुटीर, ब्राम्हणपारा
छुईखदान
जिला - राजनांदगांव 6छ.ग.8

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