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इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

बुधवार, 4 सितंबर 2013

ले चल वहाँ भुलावा देकर


 जयशंकर प्रसाद
ले चल वहाँ भुलावा देकर
मेरे नाविक ! धीरे - धीरे ।

          जिस निर्जन में सागर लहरी,
          अम्बर के कानों में गहरी,
          निश्छल प्रेम - कथा कहती हो
          तज कोलाहल की अवनी रे ।
          जहाँ साँझ - सी जीवन - छाया,
          ढीली अपनी कोमल काया,
          नील नयन से ढुलकाती हो
          ताराओं की पाँति घनी रे ।

   जिस गम्भीर मधुर छाया में,
   विश्व चित्र.पट चल माया में,
   विभुता विभु - सी पड़े दिखाई
   दुख - सुख बाली सत्य बनी रे ।
   श्रम - विश्राम क्षितिज - वेला से
   जहाँ सृजन करते मेला से,
   अमर जागरण उषा नयन से
   बिखराती हो ज्योति घनी रे !

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