इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 4 सितंबर 2013

ले चल वहाँ भुलावा देकर


 जयशंकर प्रसाद
ले चल वहाँ भुलावा देकर
मेरे नाविक ! धीरे - धीरे ।

          जिस निर्जन में सागर लहरी,
          अम्बर के कानों में गहरी,
          निश्छल प्रेम - कथा कहती हो
          तज कोलाहल की अवनी रे ।
          जहाँ साँझ - सी जीवन - छाया,
          ढीली अपनी कोमल काया,
          नील नयन से ढुलकाती हो
          ताराओं की पाँति घनी रे ।

   जिस गम्भीर मधुर छाया में,
   विश्व चित्र.पट चल माया में,
   विभुता विभु - सी पड़े दिखाई
   दुख - सुख बाली सत्य बनी रे ।
   श्रम - विश्राम क्षितिज - वेला से
   जहाँ सृजन करते मेला से,
   अमर जागरण उषा नयन से
   बिखराती हो ज्योति घनी रे !

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