इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 4 सितंबर 2013

परऊ बैगा

पदमराग शुक्ल
अद्भूत है हमारा महाविद्यालय। यहां राष्ट्रीय सेवा योजना की तीन - तीन इकाइयाँ कार्यरत है। बड़े प्रयोगधर्मी है यहां कार्यक्रम अधिकारी च्च्सर ज्ज्लोग। एन. एस. एस. के अंर्तगत हर वर्ष 10 दिवसीय शिविर लगता है। ऐसे ही एक शिविर में मेरा जाना हुआ। गत वर्ष की ही बात है। क्वांर का महीना नवरात्रि चल रहा था। बिलासपुर - रतनपुर रोड में 10 किलोमीटर दूर ग्राम सेंदरी में हमारा शिविर आयोजित हुआ।
शिविर को लगे आज पांच दिन हो गये। दिन भर सुबह से देर रात तक शिविर की दिनचर्या इतनी व्यस्त थी कि ठीक से साँस लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती थी। प्रात: 5 बजे शैय्या त्याग, 6 बजे प्रात:कर्म, 7 बजे पी.टी. प्रार्थना, 8 बजे चाय नास्ता, 9 बजे श्रमदान, 10 बजे अनुभव लेखन, 11 बजे स्नान, 12 बजे भोजन 1 बजे विश्राम, 2 बजे सांस्कृतिक कार्यक्रम का पूर्वाभ्यास, 3 बजे गोष्ठïी, 4 बजे मध्यान्तर, 5 बजे खेलकूद, 6 बजे सांध्यकर्म, 7 बजे प्रार्थना 8 बजे भोजन, 9 बजे सांस्कृतिक कार्यक्रम ... देखा न आपने, कहीं है अवकाश ? सांस लेने का ...?
इसी व्यस्त कार्यक्रमों के बीच एक संध्या मैं भ्रमण हेतु गांव के बाहर श्मतला रोड में गांव से एक किलोमीटर दूर सेंदुरा दाई का मंदिर चला गया। वहां नवरात्रि के एक सौ आठ कलश दीप जल रहे थे। होम धूप की गंध से समस्त मंदिर परिसर गमक रहा था। एक कोने में पलाश पेड़ के नीचे एक आदमी बैठा उंघ रहा था। बाद में पता चला कि वह उन्मनी अवस्था में था और उसके नेत्र अर्धनिमीलित थे। माथे सिंदुरी तिलक कुर्ते में चम्पक का फू ल नीचे स्वच्छ धोती नंगे पैर मुझे देखते ही अपने पास बुला लिया। पोलीथीन का एक बोरा बिछाकर बोला - बैठिए .. मैं चुपचाप बैठ गया। उन्होंने धीरे से पूछा - आप लोग शिविर वाले विद्यार्थी हो ? मैंने हामी भरी। उन्होंने कहा - आपको आज मैंने ही बुलाया था, मैने कहा  - मुझे तो किसी का बुलावा नहीं मिला। मैं अपने मन से आया हूं। उन्होंने कहा - 150 छात्र- छात्राओं के शिविर में आप अकेले इधर कैसे आ गये, कैसे और क्योंकर हुआ आपका मन इधर आने को ? मैं चुप रहा उन्होंने पुन: कहा - यह सब भगती महामाया की प्रेरणा से हुआ देगुन गुरू की आप पर कृपा है। आप निर्भय होइये और जीते जी जीवन को धन्य कीजिए।
मुझे वहीं बैठे उस व्यक्ति ने 6 बाद में पता लगा कि उसका नाम परऊ है और वह इस गांव का बैगा है 8 गांव के भूगोल का सजीव वर्णन सुनाया कि दक्षिण में अरपा नदी बहती है उसके किनारे ही सेन्दुरा ने इस गांव को बसाया था। सेन्दुरा रतनपुर के कलचुरी नरेश जाजकवदेव की पुत्री थी। बाल्यकाल से हमारे अंचल के प्रसिद्ध सिद्ध तांत्रिक करूपाद के सम्पर्कमे आ गई। करूपाद आश्रम आज जहां सिद्धेश्वरी समूह का आश्रम है वहीं पर अरपा और ताला नाला के संगम में था किन्तु वे प्राय: भैरव से मिलने रतनपुर जाया करते थे। वहीं जाजकवदेव की पत्नी तीजमन भी आती थी। उनकी बेटी सेन्दुरा भी साथ होती थी। भैरव के आश्रम में हवन होता था। कुण्ड में हजारों रतालू 6लाल कुमुदनी 8 के महावरी रंग के फूल खिले होते थे। उनके शिष्य दोनों में ताजा मधु पीने को देते सेन्दुरा भौचक्की हो इन सिद्धों के सम्भाषण को सुनती रहती।
युवती होने पर उसने आम लड़कियों के समान शादी व्याह और घर गृहस्थी की जिन्दगी को नकार दिया। उसने कहा कि वह किसी साधक से ही विवाह करेगी। उसे हाड़ मांस का पुतला नहीं चाहिए जो जीते जी मरजीवा की जिन्दगी बिताने तैयार हो वही मेरा जीवन साथी हो सकता है। विन्ध्य का एक राजकुमार मदनसिंह तैयार हो गया, अपने जीवन को दांव पर लगाने के लिए। बड़ी कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ा था मदनसिंह को। रतिक्रीड़ा के चरमक्षणों में भी उसको होश साधना पड़ा था। अद्भूत अनुभव था ववह कब रात बीत गई पता नहीं चला। गजब की भैरवी थी परीक्षा लेने वाली, सुखमत नाम था उसका केंवट परिवार में जन्म लिया था। उसके परीक्षण के बाद भैरव ने सेन्दुरा से कहा - यह सच्चा साधक है, इसकी कुंडलिनी जागृत है। इसका वरण कर सकती हो, और सेन्दुरा ने उसे जीवन साथी के रूप में स्वीकार कर लिया।
मैं परऊ की बातों को मंत्रमुग्ध की भाँति सुनता रहा। मंदिर में नेवरात गीत गाया जा रहा था। मैंने परऊ से माफी मांगते हुए कहा -  शिविर के नियमानुसार रात्रि के 10 बजे के पूर्व मुझे शिविर में हाजिर होना है। मैंने भोजन भी नहीं किया है। ऐसे में शिविर से निकाल दिया जाऊंगा। परऊ ने कहा - लाखों में किसी एकाध को महामाया चयन करती है। तुम पर मां सेन्दुरा प्रसन्न तुम आज रात यहीं रूको। आज तुमको भोजन की आवश्यकता भी नहीं है।
इसके बाद परऊ मुझे पलाश कुंज में ले गया जहाँ एक भैरवी बैठी थी। उसने मेरे रीढ़ की हड्डी का स्पर्श किया जिससे पूरे शरीर में सनसनी फैल गई। एक बार मैं बिजली के नंगे तार को छू लिया था तब जैसे शरीर में सनसनी फैली थी, कुछ - कुछ इसी तरह। भैरवी ने मातृवत पुचकारा और अपने आलिंगन में ले लिया फिर तो वह महारास सामने आया जिसका उल्लख केवल साहित्य में पढ़ा था, कभी उस पर विश्वास नहीं हुआ था। गत वर्ष महाविद्यालयल के टूर में खजुराहो गया था वहां की मूर्तिशिल्पों को देखकर जो जो अकल्पनीय चिन्तन मन में आया था उन सभी की साक्षात अनुभूति हुई। भैरवी लगातार मीठे स्वर में कहती रहती थी - साधक होश में रहना, तुम शरीर नहीं। शरीर तुम्हारा है। यह सब जो भोग रहे हो, वही माया है। तुम पर महामाया की कृपा है। इससे ऊपर उठो।
कब रात बीत गई मुझे पता नहीं चला। प्राात: ब्रम्हा्र बेला में भैरवी ने मुझे मुक्त कर दिया। मैं एक विचित्र और अनजान दुनियाँ में मानों विचरण कर रहा था। मंदिर में नेवरात गीत कब खतम हुआ, मुझे नहीं मालूम। चारो ओर सन्नाटा था। बाहर आया तो आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। पूर्व दिशा में शुक्र नक्षत्र अपने दिव्य प्रकाश से मानो मुझे आश्वस्त कर रहा था कि जो कुछ आज मैंने जाना है वह अत्यंत दुर्लभ है। इसे निरन्तर बनाये रखना है। यह सतोरी प्रमाद करने पर बिला जायेगी। परऊ बैगा ने मुझे मुंह धुलवाया और शिविर जाने को कहा।
शिविर में पांच बजे जागरण की घंटी बज चुकी थी। लाउडस्पीकर में रामचरित मानस की पंक्ति च्च् मंगल भवन अंमगल हारी ... ज्ज् बज रहा था। सभी छात्र - छात्राएं प्रात: कर्म हेतु बाहर आ रहे थे। उन्हीं के साथ मैं भी हो लिया। किसी ने नहीं पूछा कि मैं रात कहाँ था। पी.टी. प्रार्थना मैं विधिवत शामिल हुआ। सब कुछ पूर्ववत चल रहा था। फिर भी मेरे अन्तर आकाश में इतना बड़ा परिवर्तन हो गया था कि मुझे बात - बात में हंसी आ रही थी। मेरे कई मित्रों ने मुझे टोका कि मैं इतना प्रसन्न क्यों हूं ? मुझे अकारण पसीना आने लगा था। श्रमदान के समय अन्य दिनों की तुलना में तीन गुना परिश्रम किया फिर भी थकान का नामोनिशान नहीं। सब कुछ मुझे खेल लग रहा था। कभी - कभी तो आकाश में उड़ने का बोध होता था।
दोपहर संगोष्ठïी में मेरे वक्तव्य पर बहुत तालियाँ बजी। मेरे मित्र ने पूछा - कहां से मसाला पाया। कब रट लिया। आज तो ऐसा लग रहा था मानो टेप बज रहा है। जिससे मिलता बड़े प्रेम से मिलता। लोगों को आश्चर्य हो रहा था कि मुझमें एकाएक परिवर्तन हो रहा है। शाम को जब जनसम्पर्क में गये तो छात्राओं ने मुझे अपने ग्रुप में शामिल कर लिया। रास्ते में पूछा कि तुम कुछ गोलियाँ खाते हो क्या ? तुम्हारे चेहरे की लाली इतनी क्यों बढ़ गयी ? तुम इतने आकर्षक क्यों लग रहे हो ? मैंने पूरी तरह नकार दिया। कैसे बताता - बीती रात क्या हुआ था ?  हम लोग एक परिवार से कुशलक्षेम पूछ रहे थे। उस परिवार के मुखिया का नाम था भगऊ केवट। उसने कहा - हमारे गांव में एक मंदिर है, करूआ बाबा का। उसमें जोड़ा बकरा बलिदान करने पर सिद्धि प्राप्त होती है। यहां के गुलामा महराज उनके कोप के कारण ही मर गये। एक भैरवी थी - बतिया उन्होंने बहुत समझाया किन्तु नहीं माने।
उसकी बातों को सुनकर पहली बार मैं भयभीत हुआ। मुझे फिर पसीना आने लगा। मैंने छात्राओं से माफी मांगते हुए कहा - मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है। मैं वापस शिविर लौटना चाहता हूं। शिविर आकर सो गया। कब शाम हुई, कब रात हुई ? कब लोगों ने भोजन किया ? कब सांस्कृतिक कार्यक्रम खतम हुआ, मुझे नहीं मालूम। एक से एक दिव्य सपने आ रहे थे लग रहा था - मैं शरीर से विलग एक दिव्य चेतना हूं।
दस बजे रात को शिविर संयोजक एक डाक्टर को लेकर आ गये। उन्होंने मेरा चेकअप किया और एक इंजेक्शन लगा दिया। मैं विरोध करता रहा मगर सर नहीं माने। खूब गहरी नींद आई। सबेरे उठा तो ठीक लग रहा था। किन्तु वह दिव्य अनुभूति गायब हो चुकी थी। मैं  उस अनुभूति के लिए व्याकुल हो उठा। दौड़ा - दौड़ा सेन्दुरा दाई के मंदिर गया किन्तु वहां परऊ बैगा से भेंट नहीं हुई। उस भैरवी से भेंट हुई। उसे मैंने सारा हाल बताया। उसने कहा - बैगा तो एक सप्ताह के लिए चन्दरपुर चले गये हैं, अब भेंट नहीं होगी। किन्तु आप चुक गये। आपकी जगी कुंडलिनी आप के भय के कारण लुप्त हो गई। अब आप आम आदमी हो गये। किन्तु कोई बात नहीं उस भगवती महामाया की आराधना करते रहिए कभी उनकी कृपा कदाचित फिर हो तो इस बार डरिये नहीं। मैं शिविर में लौट आया।
तीन दिन बाद शिविर समाप्त हो गया। मैं अपने साथियों के साथ महाविद्यालय लौट आया और पहले जैसा पढ़ने - लिखने लगा किन्तु उस शिविर में मिले दिव्य अनुभूति की मीठी याद बनी हुई है।
बी - 5 नेहरू नगर, बिलासपुर6छ.ग.8 

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