इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 30 नवंबर 2007

कल और आज

माता कौशल्य का मायका छत्तीसगढ़
संत पवन दीवान
छत्तीसगढ़ राज्य हम सबका सपना था । पंडित सुन्दरलाल शर्मा,डां. खूबचंद बघेल, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, मिनीमाता, चंदूलाल चंद्राकर की विरासत हमारे पास है । हम अपने जीवन काल में छत्तीसगढ़ राज्य को पा सके यह हमारी पीढ़ी का सौभाग्य है । बुजुर्ग सपना देकर चले गये । उनके आशिष से हमें हमारा राज्य मिल गया । मगर छत्तीसगढ़ राज्य अपनी विशेषता से आगे बढे यह मैं चाहता हूं ।
छत्तीसगढ़ कुछ मामलों मेें अन्य राज्यों से एकदम अलग है ।हमारी ताकत है - भाषा और संस्कृ ति । छत्तीसगढ़ संस्कृति की विशेषता है - मेल - मिलाप और आतिथ्य के साथ सत्य का आग्रह । यह गुरूघासीदास बाबा की धरती है । भगवान श्रीराम की माता कौशल्या का मायका है छत्तीसगढ़। कल्पना कीजिए कि माता कौशल्या ने भगवान राम से अपने मायके की भाषा में बात की होगी कि नहीं ? श्रीराम जब ननिहाल आते होगे तो किस भाषा में उनके मामा और अन्य लोग बाते करते रहे होंगे ? छत्तीसगढ़ी में ही । यह इतनी पुरानी और सार्थक भाषा है । छत्तीसगढ़ हनुमान जी की तरह है । इसे अपनी शक्ति विस्मृत हो जाती है । याद दिलाने पर जागृति भी आती है । छत्तीसगढ़ ने सदैव विलक्ष्ण काम किया है ।
भगवान श्रीराम के ननिहाल में आप देखें - भांजों को, यहां मामा पूछते हैं - च्च् कहां जा रहे हो भांजा राम? ज्ज्
गीत तक में गायक गाते हैं - जय सतनाम भांजा । क्यों यह बात आती है ? सतनाम और श्रीराम पर छत्तीसगढ़ की आस्था इसे पूरे विश्व में अलग मान दिलाती है ।
भगवान श्रीराम और माता कौशल्या की प्राचीन मूर्ति ग्राम चंदखुरी के तालाब में स्थित है । यह अकेली मूर्ति इतिहास की साक्षी है । इस जानकारी और इतिहास के सत्य को दुनिया जाने इसके लिए जरूरी है - माता कौशल्या और श्रीराम की भव्य और नई मूर्तियों की श्र्रंृखला की स्थापना । छत्तीसगढ़ राज्य अभी सजा नहीं है । इसे सज्जित करने का क्रम जारी है । सज्जित करने के संदर्भ में इतिहास और संस्कृति के प्रमाणों को जन - जन तक पहुंचाने का प्रयास होना चाहिए ।
माता कौशल्या की गोद में बैठे श्रीराम की भव्य मूर्ति का माडल पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के प्रसिद्घ मूर्तिकार श्री जे.एम.नेल्सन ने बनाकर हम सबको चकित कर दिया। डां. परदेशीराम वर्मा के आग्रह पर अगासदिया के कार्यक्रम में पधारे प्रदेश के मुख्यमंत्री डां.रमनसिंह ने अत्यंत सुन्दर माडल का अवलोकन कर कलाकार की पीठ थपथपाने से नहीं अपने आप को रोक नहीं सके । वे मूर्ति देखकर अभिभूत हो गये । अगर ऐसी भव्य मूर्ति किसी पवित्र स्थल में भव्यता के साथ स्थापित हो जाए जहां लाखों लोगों का मेला लगता हो तो छत्तीसगढ़ के गौरवशाली इतिहास की जानकारी जन - जन तक प्रभावी ढंग से पहुंचेगी । यह स्थान कुम्भ आयोजन के कारण देश भर में चर्चित राजिम भी तो हो सकता है। एक जगह स्थपना के बाद क्रमश: ऐसी मूर्तियां अन्य स्थानों में भी स्थापित हो सकती है ।
छत्तीसगढ़ समन्वयवादी है। हिंसा, अक्रामकता पर इसकी आस्था नहीं है। इसने सबको सम्मान दिया।
माता कौशल्या महाराज दशरथ की पटरानी थी। छत्तीसगढ़ की बेटी अयोध्या गई। श्रीराम का विवाह जनकपुर में हुआ। इस तरह होता है भू - भाग का समन्वय। यहां संस्कृति मेल शुरू से रहा है,लेकिन सब अपनी पहचान के साथ ही मेल चाहते हैं। इसमें यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि हम अपनी पहचान मिटाकर मेल करें।
गुजरात में गुजराती,पंजाब में पंजाबी, महाराष्टï्र में मराठी, इस तरह भाषा - वार प्रांत है। ऐसे में यह बेहद दुख की बात है कि छत्तीसगढ़ी को भाषा का दर्जा नहीं मिला। छत्तीसगढ़ का मतलब ही है छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति।
छत्तीसगढ़ में आदिवासी, दलितों, पिछड़ों बाहुल्य है। वनों की दृष्टिï से यह देश का अव्वल राज्य है। खनिज यहां प्रचुर है। हीरा - लोहा यहां सब है। इसकी तरक्की बहुत तेजी से होगी। लेकिन संकट को समझना भी है। आज आवागमन और अन्य सुविधा भी बहुत है। छत्तीसगढ़ का सीधापन उसका दुश्मन है। सीधे - सादे छत्तीसगढ़ का हक उसे मिलना चाहिए। ऐसा न हो कि ताकत और चुस्ती के बल पर अन्य उसके हकों पर प्रहार कर दे। इससे असंतोष पैदा होगा। इसलिए छत्तीसगढ़ी मानस को समझते हुए इस दिशा में गंभीर काम होना चाहिए। मध्यप्रदेश तथा अन्य राज्यों में जो साहित्यिक गतिविधियां है। शासन के द्वारा प्रोत्साहन है। उसके अनुरूप यहां भी ठोस पहल जरूरी है। छत्तीसगढ़ी में एक विशिष्टï पत्रिका  जरूरी है जिसमें हिन्दी भी हो लेकिन छत्तीसगढ़ की विशेषता उसमें दिखे। ऐसा प्रयास अभी होना बाकी है।
च्च् बिहनिया ज्ज् पत्रिका की कोई विशेष पहचान इसलिए नहीं बनी क्योंकि वह नियमित नहीं निकलती। संस्कृति विभाग के पास दस तरह के काम है। उसमें पत्रिका भी एक है। इस तरह  गंभीर काम नहीं होते। मध्यप्रदेश सरकार की पत्रिका है। उत्तरप्रदेश,हिमाचल प्रदेश,पंजाब सबकी पत्रिकाएं प्रतिष्ठिïत हो चुकी है। छत्तीसगढ़ में जाने क्यों साहित्य का काम ढंग से नहीं हो रहा है।
छत्तीसगढ़ के जानकारों,संस्कृति के विशेषज्ञों और सुयोग्य व्यक्तियों की खोज कर दायित्व देने से छत्तीसगढ़ की फि$जा बदलेगी। सैद्धांतिक असहमति के बावजूद सही सोच के लोग बड़ा काम कर जाते हैं। जबकि सहमति और निष्ठïा का स्वांग भरकर कुटिल लोग नुकसान कर देते हैं। छत्तीसगढ़ में कई ध्रुवों को एक ही मंच पर प्रतिष्ठïा मिली है। यहां सभी धर्मों के महापुरूष, आचार्य, अवतार और गुरू आये और उन्होंने भरपूर मान पाया। समन्वय की इस धरती में गुण के आधार पर ही व्यक्ति की प्रतिष्ठïा होती रही है। यह परंपरा और समृद्घ  हो ..........।
नयापारा,राजिम ( छ.ग.)

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