इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 4 सितंबर 2013

इंतजार

कुहेली भट्टाचार्य
इंतजार में रहेगा सवेरा
ओस से भीगे होंठो को
भीगे ही रहने दो
धूप का पहला चुम्बन
तुम्हारा ही रहेगा।
सूरज की पहली किरण से
तुम क्यों डर गये थे ?
वह तो प्यार था !
आज का सन्नाटा तुम्हें छू जाए
तो गम न करना
कल तुम्हारा ही है
सिर्फ तुम्हारा !
बस इंतजार करना !
क्यों भूल जाते हो
उन मौसमों को
जब दीवारों में दरारें न थीं
आंखों में काजल और होठों में लाली थी
गर्मियों में पुरवाई चलती,
जाड़ों में धूप खिलती थी,
आज ओस में भीगे होंठो को
भीगे ही रहने दो
अगले मौसम में
साखें हिलेंगी, फूल खिलेंगे
मुरझायेंगी नहीं कलियां
थरथराहट दिल में लिये
इंतजार में रहेगा सवेरा।
123 ए, सुन्दरआपर्ट, जिन्बरच
नई दिल्ली - 87

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