इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

हंसमुख रामदेपुत्रा की दो लघुकथाएं

घर
मीना हाय र सेकेन्डरी पास करके काँलेज में जाकर उ‚ अ¨यास करना चाहती थी. वह महत्वाकांक्षी थी. कोई बड़ा अफसर बनने की तमÛा रखती थी. लेकिन परिवार वाले य ह बात के विरोधी थे.
मीना की माता कहती - अब तुझे आगे पढ़ना नहीं है.
मीना पूछती - यिों ?
तुरन्त मीना को उत्तर मिलता - अपने घर जाके पढ़ना
मीना की शादी हो गई. वह ससुराल आयी. सभी सदस्य  दयालु दिखाई पड़ते थे. मीना ऐसा परिवार पाकर खुश हो गई.
एक बार मीना ने अपनी सास से कहा - अब मैं आगे काँलेज का अ¨यास करना चाहती हूं.
य ह सुनकर मीना की सास ने कटुवच न कहा - अब तु यिा पढ़ेगी ? पढ़ना तो तेरे घर पर ही पूणर् हो गया. य ह तो ससुराल है. य हां पढ़ना कहा से ?
मीना सोच ने लगी - घर किसको कहा जाता है. मैके या ससुराल को ?
कमाऊ बेटा
मोहनलाल को अपने साथ रखने के लिए तीनो बेटे में से कोई तैयार नहीं थे. यिोंकि मोहनलाल अब वृद्ध और अशति थे. नौकरी पूणर् हो गई थी. पेन्शन की रकम कम थी. मोहनलाल ने अपने सब पैसे बेटों को दे दिया था.
लेकिन फिर भी वह लाचार और कमजोर नहीं थे. उन्होंने बेटों को स्पý कह दिया - मैंने तीनों को पढ़ाया, नौकरी पर लगाया और शादी भी कर दी. अब मैं अपनी जिम्मेदारी से मुति हो गया हूं.
एक बेटे ने प्रस्ताव पेश किया - तीन मकान आपके पास है. अब वह हम तीनों को दे दीजिए. फिर हम आपके साथ रखेंगे.
दोनों बेटों ने भी इस प्रस्ताव में सहमति बताई. मोहनलाल ने गुस्से में आ गये. वे बोले - तीनों मकान मैंने मेहनत से बनवाये हैं. वह तुम्हारे नहीं है, समझे ?
तीनों बेटों ने एक साथ कहा - मकान हमारे नहीं है तो आप भी हमारे नहीं है.
मोहनलाल ने अपने तीनों मकान का बंटवारा न करने दिया. यिोंकि वह तीनों मकान मोहनलाल के लिए कमाऊ बेटे के समान थे.
मोहनलाल मकान के किराये की रकम से आनंद से जी सकते थे.
स्वाथीर् बेटों ने साथ न दिया लेकिन तीनों मकान ने कमाऊ बेटे बन के साथ दिए.
 द्वारा महंतश्री वीरदासजी विद्यामंदिर, गांव - महियारी - 362 62,
वाया - बांटवा, जिला - पोरबंदर (गुजरात)

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