इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

हंसमुख रामदेपुत्रा की दो लघुकथाएं

घर
मीना हाय र सेकेन्डरी पास करके काँलेज में जाकर उ‚ अ¨यास करना चाहती थी. वह महत्वाकांक्षी थी. कोई बड़ा अफसर बनने की तमÛा रखती थी. लेकिन परिवार वाले य ह बात के विरोधी थे.
मीना की माता कहती - अब तुझे आगे पढ़ना नहीं है.
मीना पूछती - यिों ?
तुरन्त मीना को उत्तर मिलता - अपने घर जाके पढ़ना
मीना की शादी हो गई. वह ससुराल आयी. सभी सदस्य  दयालु दिखाई पड़ते थे. मीना ऐसा परिवार पाकर खुश हो गई.
एक बार मीना ने अपनी सास से कहा - अब मैं आगे काँलेज का अ¨यास करना चाहती हूं.
य ह सुनकर मीना की सास ने कटुवच न कहा - अब तु यिा पढ़ेगी ? पढ़ना तो तेरे घर पर ही पूणर् हो गया. य ह तो ससुराल है. य हां पढ़ना कहा से ?
मीना सोच ने लगी - घर किसको कहा जाता है. मैके या ससुराल को ?
कमाऊ बेटा
मोहनलाल को अपने साथ रखने के लिए तीनो बेटे में से कोई तैयार नहीं थे. यिोंकि मोहनलाल अब वृद्ध और अशति थे. नौकरी पूणर् हो गई थी. पेन्शन की रकम कम थी. मोहनलाल ने अपने सब पैसे बेटों को दे दिया था.
लेकिन फिर भी वह लाचार और कमजोर नहीं थे. उन्होंने बेटों को स्पý कह दिया - मैंने तीनों को पढ़ाया, नौकरी पर लगाया और शादी भी कर दी. अब मैं अपनी जिम्मेदारी से मुति हो गया हूं.
एक बेटे ने प्रस्ताव पेश किया - तीन मकान आपके पास है. अब वह हम तीनों को दे दीजिए. फिर हम आपके साथ रखेंगे.
दोनों बेटों ने भी इस प्रस्ताव में सहमति बताई. मोहनलाल ने गुस्से में आ गये. वे बोले - तीनों मकान मैंने मेहनत से बनवाये हैं. वह तुम्हारे नहीं है, समझे ?
तीनों बेटों ने एक साथ कहा - मकान हमारे नहीं है तो आप भी हमारे नहीं है.
मोहनलाल ने अपने तीनों मकान का बंटवारा न करने दिया. यिोंकि वह तीनों मकान मोहनलाल के लिए कमाऊ बेटे के समान थे.
मोहनलाल मकान के किराये की रकम से आनंद से जी सकते थे.
स्वाथीर् बेटों ने साथ न दिया लेकिन तीनों मकान ने कमाऊ बेटे बन के साथ दिए.
 द्वारा महंतश्री वीरदासजी विद्यामंदिर, गांव - महियारी - 362 62,
वाया - बांटवा, जिला - पोरबंदर (गुजरात)

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