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बुधवार, 4 सितंबर 2013

गाँव के सुरता

गाँव के सुरता
 डाँ. एच . डी. महमल्ला ' हर्ष '
ददा मोला घेरी - बेरी, आथे गाँव के सुरता ।
पान रोटी च टनी अऊ, भांटा के भरता ।।
संग के संगवारी अऊ, गिल्ली भांवरा बांटी ।
बारी के हरिय र मिरचा, हंड़िया के बासी ।।
आमा बगीचा, खेत खार, तरिया के रसता ।
ददा मोला घेरी - बेरी आथे गाँव के सुरता ।।
बजार के च ना मुरार्, डोकरी दाई के ओली ।
परछी के ढ़ेंकी कुरिया, छोटे रंधनी खोली ।।
बबा के गांधी टोपी, पंडरा धोती कुरता ।
ददा मोला घेरी - बेरी, आथे गाँव के सुरता ।।
बहिनी संग झगरा झांसा, दाई के दुलार ।
इसकुल मा गुरूजी के, छड़ी के मार ।।
बर - पेड़ के झुलना, अऊ खेत जाय  के धरसा ।
ददा मोला घेरी - बेरी , आथे गाँव के सुरता ।।
सावन के झड़ी झकिर, भादो के रेला ।
गंवई - गाँव के कातिक पुन्नी, तरिया पार के मेला ।।
सुरोती के कांदा कुसा, देवारी के करसा ।
ददा मोला घेरी - बेरी , आथे गाँव के सुरता ।।
फागुन के ठेठरी रोटी, हरेली के चि ला ।
खावन ददा बैठ के, जम्मों माइ पिला ।।
बिहाव के लाडू - अरसा, मरनी के बरा ।
ददा मोला घेरी - बेरी, आथे गाँव के सुरता ।।
नोहर होगे सहर मा, कोइली के गुरतुर बानी ।
अत्तर के फोहा असन, उड़ गे मया मितानी ।।
गुन - गुन के चुहथे आंसू, सावन कस बरसा ।
ददा मोला घेरी - बेरी, आथे गाँव के सुरता ।।
गुरूर, जिला - दुर्ग (छ.ग.)

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