इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 11 सितंबर 2013

धड़कते लौ का पुंज : सृजन सृजन में .

समीक्षक - डां. अनुज प्रभात
सृजन - सृजन में ... युवा कवि रामकुमार भूआर्य आकुल की काव्यात्मक रचनाओं का संग्रह है। ये रचनाएं हिन्दी गीत संग्रह के रूप में है। काव्यात्मक दृष्टिï से संग्रह की रचनाएं गीत के साथ - साथ कवितात्मक भी है जिसके भीतर संवेदना का समावेश है।
संवेदना मनुष्य की प्रवृति है और संवेदन शून्यता निर्जीवतापरक है। किन्तु संवेदना में सकारात्मक विचार और गंभीर चिंतन जब शब्दों के घेरे में आता है तो वह काव्य बन जाता है। रामकुमार भूआर्य आकुल का सृजन - सृजन में ऐसा ही संग्रह है। इसमें विविध विषयों आधारित विविध रचनाएं हैं जो प्रकृति को संवेदित करे अथवा नहीं, कवि ह्रïदय को अवश्य संवेदित किया है। इसका उदाहरण इनकी रचना अबला है नारी की ये पंक्तियाँ हैं -
वक्त की दहलीज पर वह है तिरस्कृत,
अपनों से ही छली हुई है छटपटाती,
आंसूओं से जख्म पर मरहम लगाती,
भूआर्य अपने सृजन - सृजन में संस्कृति और संस्कार को नहीं भूले हैं। आज संस्कृति का जो हा्रास हो रहा है उसका दंश उन्हें सालता है। इसलिए वे लिखते हैं -
लोप हो रहे, आज संस्कृति - संस्कार हमारे
इन कुचक्रों से हमें भला कौन उबारे ?
और यह एक सच्चाई है। आज की सामाजिक स्थिति में संस्कार कम कुचक्र जादा है। ऐसे में लोग जो जी रहे हैं, विष पी रहे हैं। इस लिए कवि भूआर्य आकुल होकर मेरा ध्येय शीर्षक के अंर्तगत लिखते हैं -
विषधरों की इस शहर में, विष को अमृत सा पीया है,
विपदा में भी सीना ताने, अडिग हिमालय सा जीया है।
कवि भूआर्य की सोच जहां काल और परिस्थिति के सापेक्ष हैं वहीं सृजन - सृजन में अपनी गतिशीलता,श्रृंगारात्मक पथ पर भी दिखलाई है। श्रृंगार रस तो जीवन के साथ ऐसा जुड़ा है जो कवि न होते हुए भी आदमी को कवि बना देता है। फिर भूआर्य तो कवि हैं ही। वे इससे अछूते कैसे रहते-
ओढ़ रखी थी वो अधरों में वही परिचित मुस्कान,
लज्जा में लिपटी सलोनी की वही अपरिमित शान।
अब चूंकि श्रृंगार रस से जुड़ी प्रकृति होती है और प्रकृति का वास गाँवों के खेतों, खलिहानों,सुरतालों,नदियों,पहाड़ों में होता है तो ऐसे जन - जीवन के प्रति कवि की दृष्टिï न जाएं ऐसा हो ही नहीं सकता। ऐसे जन - जीवन का स्थल भारत का गाँव होता है। गाँव जहां की हवा स्वच्छ, वातावरण स्वच्छ,लोग स्वच्छ किन्तु आज समय बदल गया है। शहर की उमस गांवों में घूस आयी है। प्रेम सौहार्द्र के बीच पनपने लगे हैं द्वेष। इसलिए कवि मर्माहत होकर अपनी रचना बदल गया है मेरा गाँव में लिखते हैं :-
कोई नहीं किसी की सुनते, मौसम है बड़ा बेहाल।
आपसी रंजिश और कलह में, मिलते नहीं है ताल॥
निष्कर्षत: राम कुमार भूआर्य आकुल की सृजन - सृजन में ... युवा ह्रïदय में धड़कते लौ का पुंज है। इस पुंज में काल और परिस्थिति का समावेश है। अत: यह पाठक को प्रभावित करने में सफल है।
पुस्तक का नाम :- सृजन - सृजन में ...
कवि :- रामकुमार भूआर्य आकुल
मूल्य :- साठ रूपए
प्रकाशक - पुष्पगंधा प्रकाशन,
कवर्धा छत्तीसगढ़

दीनदयाल चौक,फारविस गंज अररिया
पिन 854318 ( बिहार )
भटकाव के दौर में मूल्यों की तलाश
काव्य संग्रह - आसमां छोड़ सूरज चल देगा
संतोष श्रीवास्तव सम का सद्य रचित काव्य संग्रह आसमां छोड़ सूरज जब चल देगा अपसंस्कृति के वर्तमान दौर में भारतीय संस्कृति के उच्चतम मूल्यों की वकालत करता है। राष्टï्रभक्ति दया, करूणा की जमीन से जोड़ रखने की कोशिश इन कविताओं में स्पष्टï दृष्टिïगोचर होती है।
पहली कविता संग्रह की उत्कृष्टï कविता है। यह कविता मानवीय संवेदनाओं और प्रकृति से खिलवाड़ करते मानव के लिए एक चेतावनी है, संभावित विभीषिका का भय तो है, किन्तु ग्रहण से जूझता सूरज उम्मीद भी जगाता है। देश प्रेम की भाव भूमि पर एकाधिक कविताएं हैं कहीं शहीदों का श्रद्वांजलि दी गई है तो कहीं महापुरूषों की दृढ़ता और उनकी पीड़ा जनक यात्रा तथा प्राचीन काल के गौरव की प्रासंगिकता का आग्रह है।
निरंतर गतिमान समय के भीतर जीने के लिए सुप्तावस्था त्याग कर नष्टï साध्य परिश्रम, संघर्ष और इच्छा शक्ति की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कवि देश के युवको को पुनर्निर्माण हेतु खप जाने को प्रेरित करता है। संग्रह के बीच - बीच में राष्टï्रउत्थान का विवेकानंदी स्वप्र देखता हुआ कवि अपने समय की विडंबनाओं की पड़ताल करता चलता है। देश के गरीब चेहरे को प्रतिबिम्त करते भिखारी की महत्वहीन मृत्यु, किसान की व्यथा, मजदूरों का शोषण वर्ग संघर्ष जैसी बातें पूरी शिद्धत के साथ कविताओं में मौजूद है।
मृत्यु मानवीय संवेदनाओं को टटोलती हुई कविताएं जीवन को एक आशा आरजू और किसी मुकाम तक पहुंचाने वाली राह के रूप में स्थापित करती है। उम्मीद राख के ढेर में से जन्म लेने की कोशिश करती है हुई दिखाई पड़ती है। वैश्वीकरण व बहुीराष्टï्रीय कम्पनियों के वर्चस्व की आसंदी से दो चार होती रहती आधार भूत व्यवस्था इस संग्रह में अपनी पूरी पीड़ा के साथ मौजूद है। कवि ने प्रकृति में नारीत्व की गरिमा को एक अनोखे रूप में परिभाषित किया है।
कश्मीर जो भारत का स्वर्ग हुआ करता था, उसकी वादियों में लहलहाती केशर आज रूधिर प्रवाह बन चुकी है। बस्तर का शांत वन प्रांतर नक्सली गतिविधियों का शिकार है। जंगल के निश्चिंत स्वभाविक आदिम जिंदगी सलवाजुडू़म हो कर तहस नहस हो रही है। नदियों के जल का बंटवारा, सूखा, बाढ़, प्रदूषण जैसी चिन्ताएं कवि को बार - बार अतीत की ओर ले जाती है। तमाम उम्मीदों के बीच आजादी का संघर्ष और वर्तमान की भ्रष्टïाचार कालाबाजारी आदि समस्याएं एक घने कोहरे में सुंदर दृश्यों के खो जाने का आभास देती है। कवि अपने संग्रह में सर्वे भवन्तु सुखिन: विश्व शांति तथा मानव - मानव के शांति पूर्ण सहअस्तित्व के महत्व को पूरे दम खम से रेखांकित करता है। परमाणु बम की विभीषिका और दहेज जैसी सामाजिक बुराईयों पर कविताएं खुल कर बोली है।
आधुनिकता के विमर्श तथा निजी स्वतंत्रता की बलवती होती अवधारणओं के बीच चरित्र एक प्रकाश कुंज है। इस प्रकार तिल - तिल छिनते जाने की आशंका कवि को एक ऐसी भाव भूमि पर ले जाती है, जहां कठिन समय में मानवता को बचाए रखने का संघर्ष जारी है। तमाम वाद और विचारधाराओं से परे चश्मा कविता ने नजरिया बदल कर पूरी जीवन दृष्टिï बदल डालने का मार्ग खोल दिया है।
कवि संतोष श्रीवास्तव सम का यह प्रयास अत्यंत सराहनीय है। सूचना क्रांति के इस युग में जब कम्प्यूटर तथा टेलीविजन ने लोगों की अध्ययन वृत्ति में अनेक व्यवधान उत्पन्न किये है। पुस्तकों का लेखन और प्रकाशन रूक सा गया है। ऐसे समय में इस काव्य संग्रह का प्रकाशन साहित्य के सूखे प्रांगण में बीज अंकुरित करता है।
अधिक्ता
जवाहर नवोदय विद्यालय
गोविन्दपुर, कांकेर 6छ.ग.8
पुस्तक का नाम :- आसमां छोड़ सूरज जब चल देगा
कवि :- संतोष श्रीवास्तव सम
मूल्य :-  चालिस रूपए
प्रकाशक - नवकार प्रकाशन, कांकेर

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