इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 11 सितंबर 2013

भुइँया के लगिन.....

डॉ. जीवन यदु
भुइँया के लगिन सरग संग धरागे,
मड़वा सहीं बखरी - बारी होगे रे ।
करिया बादर,
होगे आगर,
घटा कारी हो गे रे ।
    भुँइया के तन - मन दूनों सितरगें ।
    चातर अउ डोंगर दूनों हरियागें ।
    बादर रितोवय कभू बरपेली ।
    भुइँया के मन मं जगावय हरेली ।
    घुडुर - घाड़र करथे बादर बइहा ह,
    बाजा - रूँजी के तियारी होगे रे ।
भुइँया करत हे सवाँग सवाँगे ।
रखिया - तरोई - तुमानार टाँगे ।
हरियर लुगा फूल के छप्पा वाला ।
ओरमाही काली करेला के माला ।
पाना नवा, फूल नवलख सवाँगा ।
सोन - चाँदी घलो लबारी होगे रे ।
    नाँगर ल धरके निकलगे नँगरिहा ।
    बइला लागे घलो खरतरिहा ।
    ठउँका सवाँगा इही मन करैया ।
    एमन हें भुइँया के , इखरे हे भुइँया ।
    जाँगर अउ नागर बदिन हे मितानी,
    बादर घलो संगवारी होगे रे ।
मनखे के हिरदे होगे सुआ पाँखी ।
झूलय मयारू ह आँखिच आँखी ।
हिरदे मं बीजा रहिस हे मया के ।
पीका कस फू टिस उही उम्हियाके ।
ननपन मं नान्हें रिहिस हे मया ह,
कउखन जल्दी मोटियारी होगे रे ।
गीतिका
दाउचौरा, खैरागढ़, जिला - राजनांदगांव6छ.ग.8

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