इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

एक ही विधा पर लेखन सफलता दिलाती है

विभिन्न अवसरों पर नगर में आयोजित कवि गोष्ठियों में मुझे बकायदा आमंत्रित किया जाता है। मैं वहां उपस्थित भी होता हूं। मुझे कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया जाता है। मैं असमंजस की स्थिति में रहता हूं। मेरा विषय कविता लेखन नहीं अपितु कहानी लेखन है। भला कविता कहां से और कैसे सुनाऊ ? अन्य लेखक मित्र ताना मारते हैं कहानी के साथ कविता क्यों नहीं लिखते ? अब मैं उन्हें कैसे समझाऊं कि मेरी विधा कहानी लेखन है न कि कविता लेखन। एकाध अवसर पर इस बात का खुलासा भी किया मगर वे हंस कर टाल गये। कह गए कि जो कहानी लिख सकता है वह कविता क्यों नहीं लिख सकता। मेरा तो यह मानना है कि जो लेखक विभिन्न विधाओं पर लिखने का प्रयास करता है वह निश्चित रुप से किसी भी विधा में पारंगत हासिल नहीं कर सकता। उनकी लेखन शैली में न कविता होती है न कहानी न अन्य विधा। ऐसी स्थिति में वह किसी भी क्षेत्र में अपनी प्रतिभा नहीं निखार सकता। और फिर जब कोई लेखक  विभिन्न विधाओं पर लिखकर किसी भी क्षेत्र का नहीं रह जाता इससे अच्छा तो किसी एक विधा पर ही सतत लेखन ही श्रेष्ठ है न ?
एक हमारे मित्र है, कई वर्षों से लेखन कार्य कर रहे हैं। पर वह दिशाहीनताा के कारण कभी कहानी लिखने बैठ जाता है, कभी कविता, कभी गीत तो कभी $गज़ल यहां तक कि राष्ट्रीय स्तर पर लेख, समसामायिक लेख लिखने का भी वे प्रयास किए मगर अब तक एक भी रचना को पूरी तरह नहीं लिख पाये हैं। वे कुछ दिन पूर्व ही मुझे बताये कि वे व्यंग्य लिखने का प्रयास कर रहे हैं मगर मेरा दावा है कि उनका व्यंग्य लेखन भी अपूर्ण ही रहेगा। मेरा तो विचार है कि किसी विधा पर लेखन किसी जनरल स्टोर्स में समान बेचने वाले व्यापारी के समान नहीं है जो अपनी एक छोटी सी दुकान में भी विभिन्न प्रकार के समान रखता है और उसे मालूम होता है कि कौन समान कहां पर रखा है, उसका मूल्य क्या है। लेखन तो एक ऐसी क्रिया है जो एक विधा पर लेखन करेगा वही सफल लेखक होगा। चोटी के किसी भी लेखक को देख लो सफलता उसी ने हासिल की है जो एक ही विधा पर लेखन कार्य किये है।

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