इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

एक ही विधा पर लेखन सफलता दिलाती है

विभिन्न अवसरों पर नगर में आयोजित कवि गोष्ठियों में मुझे बकायदा आमंत्रित किया जाता है। मैं वहां उपस्थित भी होता हूं। मुझे कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया जाता है। मैं असमंजस की स्थिति में रहता हूं। मेरा विषय कविता लेखन नहीं अपितु कहानी लेखन है। भला कविता कहां से और कैसे सुनाऊ ? अन्य लेखक मित्र ताना मारते हैं कहानी के साथ कविता क्यों नहीं लिखते ? अब मैं उन्हें कैसे समझाऊं कि मेरी विधा कहानी लेखन है न कि कविता लेखन। एकाध अवसर पर इस बात का खुलासा भी किया मगर वे हंस कर टाल गये। कह गए कि जो कहानी लिख सकता है वह कविता क्यों नहीं लिख सकता। मेरा तो यह मानना है कि जो लेखक विभिन्न विधाओं पर लिखने का प्रयास करता है वह निश्चित रुप से किसी भी विधा में पारंगत हासिल नहीं कर सकता। उनकी लेखन शैली में न कविता होती है न कहानी न अन्य विधा। ऐसी स्थिति में वह किसी भी क्षेत्र में अपनी प्रतिभा नहीं निखार सकता। और फिर जब कोई लेखक  विभिन्न विधाओं पर लिखकर किसी भी क्षेत्र का नहीं रह जाता इससे अच्छा तो किसी एक विधा पर ही सतत लेखन ही श्रेष्ठ है न ?
एक हमारे मित्र है, कई वर्षों से लेखन कार्य कर रहे हैं। पर वह दिशाहीनताा के कारण कभी कहानी लिखने बैठ जाता है, कभी कविता, कभी गीत तो कभी $गज़ल यहां तक कि राष्ट्रीय स्तर पर लेख, समसामायिक लेख लिखने का भी वे प्रयास किए मगर अब तक एक भी रचना को पूरी तरह नहीं लिख पाये हैं। वे कुछ दिन पूर्व ही मुझे बताये कि वे व्यंग्य लिखने का प्रयास कर रहे हैं मगर मेरा दावा है कि उनका व्यंग्य लेखन भी अपूर्ण ही रहेगा। मेरा तो विचार है कि किसी विधा पर लेखन किसी जनरल स्टोर्स में समान बेचने वाले व्यापारी के समान नहीं है जो अपनी एक छोटी सी दुकान में भी विभिन्न प्रकार के समान रखता है और उसे मालूम होता है कि कौन समान कहां पर रखा है, उसका मूल्य क्या है। लेखन तो एक ऐसी क्रिया है जो एक विधा पर लेखन करेगा वही सफल लेखक होगा। चोटी के किसी भी लेखक को देख लो सफलता उसी ने हासिल की है जो एक ही विधा पर लेखन कार्य किये है।

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