इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

गाँव छोड़ के झन जा मितान

 डा.पीसी लाल यादवगाँव छोड़ के, झन जातैं मितान रे
मोर सुन लेबे तैंहा सुजान ।
मोर गाँव हे सबके परान रे
इहाँ सुख के हवय  खदान ।
    गाँव के माटी म संगी
    माटी म मिलही मुिित ।
    इही तोर सुख - सपना
    अऊ तोर हाँसी खुसी ।
तोर जिनगी के नवा बिहान रे
गाँव छोड़ के झन जा तैं मितान ।
    गाँव के मया ह मितान
    मया ह हवै अनमोल ।
    इहाँ हितु - पिरितु अऊ
    सगा सैना के मीठ बोल ।
जुड़ाथे कल्पत परान रे
गाँव छोड़ के झन जा तैं मितान ।
    गाँँव के माटी म मयारू
    माटी म पुरखा खपगे ।
    जांगर टोर महिनत कर
    करिया लोहा कस तप के ।
महिनत के  ऊँच  मचान रे
गाँव छोड़ के झन जा तैं मितान ।
ग·डई - प·डरिया, जिला - राजनांदगांव (छ.ग.)     

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