इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 4 सितंबर 2013

डंगचगहा

 आनन्द तिवारी पौराणिक
 कुकरा बासत बड़ भिनसरहा ।
डंगनी धरे, आइस डंगच गहा ।।
ढ़म - ढ़म, ढ़म - ढ़म, ढ़ोलकी बजाइस ।
किंजर - किंजर के बड़ नरियाइस ।।
सबबो सकलाइन लीम तरी ।
सियान, जवान, मोटियारी - टुरी ।।
डंगनी म च घ गे डंगच गहा ।
रस्सी म झूलिस, अलकरहा ।।
नानुक टुरा ह ढ़ोलकी बजाइस ।
गाना गाइस अऊ चि चि याइस ।।
जम्मो देखइया तारी बजाइन ।
मंगतिन दाई किहिस - अरे डंगच गहा ।।
अइसन खेल झक करे कर रे दोखहा ।
कोनो दिन तैं धोखा खा जाबे ।
च घत - च घत, तरी म गिर जाबे ।।
अलहन ल तैं का जानबे ।
कहिदे बेटा, मोर गोठ ल मानबे ।।
डंगच गहा कथे - अओ मोर दाई ।
तोला लागत हे करलई ।।
पापी पेट बर उद्दिम करथंव ।
दु ठोमा बर, खोर - खोर घुमथंव ।।
श्रीराम टाकीज मागर्, महासमुन्द (छ.ग.)

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