इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 11 सितंबर 2013

सरकारी डाक्टर

भावसिंह हिरवानी
अन्य पेंशनरों की भांति पंचोली बाबू भी सरकारी दवाई का मोह छोड़ नहीं पाये थे। माड़ी और एड़ी में दर्द के बावजूद खुद को लगभग धकेलते हुए पत्नी की सहायता से जिला सरकारी अस्पताल पहुंच गये।
पहले तो पर्ची बनवाने के लिए उन्हें अंाधा घंटा लाइन में खड़ा रहना पड़ा। फिर दो घंटे बाद डाक्टर के पास उनका नंबर आया। उनकी तकलीफ सुनकर डाक्टर ने पेशाब और खून जांच के लिए उन्हें तकनीशियन के पास भेजा। वहां रिपोर्ट जल्दी देने के लिए उन्होंने बार - बार तकनीशियन से अनुनय करते रहे फिर भी लगभग दो बज ही गये।
पंचोली बाबू जब दोबारा डाक्टर के पास पहुंचे तो वे अन्य मरीजों को देखने में व्यस्त थे। जैसे ही उन्होंने अपनी पर्ची आगे बढ़ायी, डाक्टर साहब बोले - बस, अब कल देखेगे। आप कल आइये ...।
पंचोली बाबू लगभग गिड़गिड़ाते हुए बोले - सर आपने रिपोर्ट लाने के लिए कहा था, वही लेकर आया हूं। देख लीजिए न। वैसे भी अब मेरे बाद कोई मरीज नहीं हैं। मैं आखिरी मरीज हूं।
- नहीं, टाइम हो गया है। आज हम बहुत थक गये हैं। डाक्टर साहब ने कहा और उनकी ओर से मुंह फेर कर सामने बैठे मेडिकल रिप्रजेन्टेटिव की ओर देखने लगे।
पंंचोली बाबू कुछ देर  किंकर्तव्यविमूढ़ वहीं खड़े रहे। फिर घोर निराशा में डूबे कमरे से बाहर आ गये। बरामदे में प्रतीक्षा करती उनकी पत्नी बैठी थी। वह पंचोली बाबू की हालात देख घबरा उठी। बोली - क्या हुआ ?
दुखी पंचोली बाबू ने कहा - कुछ नहीं, मरीजों का इलाज करते - करते गद्देदार रिवाल्विंग चेयर में बैठे डाक्टर साहब थक गये हैं। उन्होंने कल आने को कहा है। चलो, किसी प्राइवेट डाक्टर के पास चलते हैं। सरकारी डाक्टर की तरह वे इतनी जल्दी नहीं थकते। फिर दोनों धीरे - धीरे चलते हुए अस्पताल से बाहर आ गये।
कबीर प्रिंटिंग प्रेस गुरूर
मु. पो. - गुरूर
जिला - दुर्ग6छ.ग.8

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