इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

अमुवा म मंजरा

श्रीमती सौरिन चन्द्रसेन
अमुवा म मंजरा मता डारे या,
    मोर कोइली गजामूंग,
भंवरा ल धंवरा बना डारे।
        पागा म कलगी सजा डारे॥
काली मेंहा देखेंव, गुनगुन गावत।
    करिया ल तोर मेंहा, फूल मंडरावत॥
आज कइसन उदिम रचा डारे या
    मोर कोइली गजामूंग,
        पागा म कलगी सजा डारे॥
तोर घर म बइठे हे,
    राजा के भेस हे।
का ओखर नांव हावे,
    कोने या देस हे॥
    मोर कोइली गजामूंग
        पागा म कलगी सजा डारे॥
गाँव, गली, खेत - खार, तरिया, अमरईया।
    देसी, परदेसी, का रदï्दा रेंगईया॥
    बोली म जग ल मोहा डारे
ये दे बोली म जग ल मोहा डारे या।
    मोर कोइली गजामूंग,
        पागा म कलगी सजा डारे॥
रूप हवय सीसी रे, बोली हे सरबत।
    मया के मोहनी म, सबो हे तोर बस
    कुहुकोली म जग ला समा डारे।
कुहुकोली म जग ला समा डारे या,
    मोर कोइली गजामूंग,
        पागा म कलगी सजा डारे॥
प्राचार्य, शा.आदर्श कन्या उ.मा.वि. महासमुन्द 6 छग. 8 

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