इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 11 सितंबर 2013

हर घड़ी उनके ही कहने

महेन्द्र राठौर
हर घड़ी उनके ही कहने वो कहाने से रहे।
हम कहाँ अपनी जगह ठीक ठिकाने से रहे॥

क्या बतायेंगे $जमाने ने अगर पूछ लिया।
तेरी तलाश में हम कितने $जमाने से रहे॥

लीजिए हम ही किये देते हैं जान, दिल कुरबां।
आप तो सनम हमसे प्यार जताने से रहे॥

एक सहारे की जुरूरत तो हुआ करती है।
बोझ $गम का है मगर आप उठाने से रहे॥

तुम मिटा दोगे तो एहसान समझ लूंगा इसे।
मेरे अरमान मेरी $जीस्त मिटाने से रहे॥
दो
तकलीफ $िजदगी की उठाई है किसी ने।
दीवार यूं भी घर की बचाई है किसी ने॥

उसकी मदद तो करते नहीं हँस रहे हैं आप।
फरियाद अपने दिल की सुनाई है किसी ने॥

लुटती है आज थाने में औरत की आबरू।
ऐसी रपट भी आज लिखाई है किसी ने॥

अब उसके गिरेबां की तलाशी कुबूल है।
बच्चों के लिए रोटी चुराई है किसी ने॥

आया फटे लिबास पे चादर को डालकर।
अपनी गरीबी यँू भी छुपाई है किसी ने॥
न्यू चंदनियापारा, जांजगीर ( छ.ग.)

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