इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

क्‍या जरूरी है

आत्माराम कोशा ' अमात्य'
च लो रोटी पर लिखते हैं कविता
च लो बोटी पर लिखते हैं कविता
च लो रोटी - बेटी पर लिखते हैं कविता
च लो रोती बेटी पर लिखते हैं कविता
पर / लिखने के पहले / थोड़ा सोचे...?
कविता क्‍या रोटी बन, पेट की आग बुझायेगी ?
कविता क्‍या बोटी बन, अंग की दाहकता को उकसायेगी ?
क्‍या कविता चुप कर सकेगी रोती हुई बेटी को
या
अनंतकाल से आ रही ..
रोटी बेटी की समस्या को  सुलाझायेगी ?
नहीं !! कविता ये सब नहीं करती
वह केवल एक भ्रम पैदा करती है.
वह,चांद को रोटी बना भूखे को भुलवारती है.
भूखे की अभिष्सा को कई - कई परतों में उघारती है.
कभी लोरी की माया से सुलवा देती है रोते को
तो
कभी नये रिस्तो में नया सम्बंधाधार देती है
इसलिए क्‍या जरूरी है
लिखने के पहले हम सोचे
रोटी / बेटी/ बोटी या कविता
पुरानी मंडी चौंक
राजनांदगांव (छग.)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें