इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

छै ठन तिनगोड़िया

        आनंद तिवारी पौराणिक
1
झूठ ह बिन पाँव उत्ता - धुर्रा भागथे
पाछू म छल , कपट, चारी ल छाँड़थे
ओकरे पायत अँधरौटी धरे कस हपटाये

        2
उत्ती के सुरुज ल सबो जल चघाथें
बने - बने के त सबो गुन गाथें
बिगड़े बखत सिरिफ ऊही काम आथे

        3
मंगनी म घलो माँगत हें मया
दुकान म बेचावत हे दया
बेचरी के जिनिस होगे लाज, सरम, हया

        4
मनखे के भीड़ ले गाँव - सहर बनाथे
ऊँच - ऊँच बिल्डिंग, तरी - ऊपर बनाथे
मयारु के मया ले एक ठन सुग्घर घर बनाथे

        5
धन अऊ दोगानी एक कोती
सरग के सुख, पन्ना, हीरा मोती
मोर दाई के आसिरबाद एक कोती
        6
भुँइया म मढ़ा दे हाथ के हथियार ल
जीत म बदलदे ये हार ल
सरग बनादे ये संसार ल

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