इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

छै ठन तिनगोड़िया

        आनंद तिवारी पौराणिक
1
झूठ ह बिन पाँव उत्ता - धुर्रा भागथे
पाछू म छल , कपट, चारी ल छाँड़थे
ओकरे पायत अँधरौटी धरे कस हपटाये

        2
उत्ती के सुरुज ल सबो जल चघाथें
बने - बने के त सबो गुन गाथें
बिगड़े बखत सिरिफ ऊही काम आथे

        3
मंगनी म घलो माँगत हें मया
दुकान म बेचावत हे दया
बेचरी के जिनिस होगे लाज, सरम, हया

        4
मनखे के भीड़ ले गाँव - सहर बनाथे
ऊँच - ऊँच बिल्डिंग, तरी - ऊपर बनाथे
मयारु के मया ले एक ठन सुग्घर घर बनाथे

        5
धन अऊ दोगानी एक कोती
सरग के सुख, पन्ना, हीरा मोती
मोर दाई के आसिरबाद एक कोती
        6
भुँइया म मढ़ा दे हाथ के हथियार ल
जीत म बदलदे ये हार ल
सरग बनादे ये संसार ल

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