इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

छै ठन तिनगोड़िया

        आनंद तिवारी पौराणिक
1
झूठ ह बिन पाँव उत्ता - धुर्रा भागथे
पाछू म छल , कपट, चारी ल छाँड़थे
ओकरे पायत अँधरौटी धरे कस हपटाये

        2
उत्ती के सुरुज ल सबो जल चघाथें
बने - बने के त सबो गुन गाथें
बिगड़े बखत सिरिफ ऊही काम आथे

        3
मंगनी म घलो माँगत हें मया
दुकान म बेचावत हे दया
बेचरी के जिनिस होगे लाज, सरम, हया

        4
मनखे के भीड़ ले गाँव - सहर बनाथे
ऊँच - ऊँच बिल्डिंग, तरी - ऊपर बनाथे
मयारु के मया ले एक ठन सुग्घर घर बनाथे

        5
धन अऊ दोगानी एक कोती
सरग के सुख, पन्ना, हीरा मोती
मोर दाई के आसिरबाद एक कोती
        6
भुँइया म मढ़ा दे हाथ के हथियार ल
जीत म बदलदे ये हार ल
सरग बनादे ये संसार ल

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