इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

माटी के सोंध - सोंध गन्ध भरे कविता के संगरह

-  समीक्षक - सरला शर्मा  -
कवि अउ ब्रम्हा दूनों ल सिरजनहार कहिथें, फेर फरक अतके हावय के ब्रम्हा के सिरजे संसार ले देख सुनके हित अहित, नफा नुकसान बने मइहन ल गुन के, बिचार करके कवि अलग संसार बसाथे जेमा दया, धरम सत इमान के जय जयकार सुनाथे त दूसर बेईमानी, परपंच, भ्रष्टाचार, अनदेखई के विरोध के सुर अकास धुवत दिख्रथे इही हर कवि के आपदधर्म आय। एकर ले विमुख होके कविता कभू लोकमंगलकारी नइ हो सकय, आनंद तिवारी पौराणिक ये कसौटी म सोरा आना खरा साबित हो गइन। पिरीत के पुरइन पान लिख के। दूसर बात के ये संगरह म आनी - बानी कविता हावय फेर समाज म घटत मन के चित्रण पूरा इमानदारी से करे गए हे। इही देखव न -
तरक्की के मंतर देत हंव फिरी।
कलजुग म बड़े हावय चमचागिरी।।
कागजी तरक्की ल पढ़त - सुनत आंखी बोजागे त कवि कल्ला के कथे -
बड़ तरक्की होवत हे ...
जेती देखबे घोटाला
रिस्वत के बजार हे इमान धरम
सत ह बोहावत धारे धार हे ...
हड़ताल करइया मन भूख मरत हे, दलाल रोटी सेंकत हें त नेता मन दूनो जुआर सोहांरी तसमई धड़कत हें। अतके नहीं सरकारी रासन दुकान म जनता बर मिलइया सस्ता रासन कबके सिराग रातोरात बड़का सेठ के गोदाम भरगे त कवि ल लिखे बर परिस -
रासन के दुकान ले चांऊर दार नंदा गे
पौराणिक जी छत्तीसगढ़ी गजल कहे हंवय ओइसे तो गजल हर परेम पिरीत के भावधारा वाला होथे फेर ऊ गजल कहे हे व्यंग करे बर बानगी देखव -
आनी बानी के बाना धरत हे मनखे।
जेठ के भोंमरा कस तपत हे मनखे।।
आजकल चारो मुड़ा भीख मंगइन के भीड़ दिखथे। किसिम - किसिम के भिखमंगा। कोनो वोट मांगत दिखथे कोनो आसरम चलाये बर दान, कोनो स्कूल बर चंदा मांगत दिखथे त कोनो कोनो भिखमंगा भगवान के भेख धर के भीख मांगत दिख जाथे कुछू कहव आंय तो सबो झन भिखमंगा च न। तीन - गोड़िया के परयोग हर हिन्दी के छनिका के सुरता देवा दिहीस बड़ नीक लागिस थोरकुन शब्द म बड़का जब्बर बिचार उजागर होये हवय। आप मन पढ़ देखव न सुग्घर  तीन गोड़िया ल-
मंगनी म घलो अब मांगत हे मया।
दुकान म बेचावत हे दया,
बजार जिनिस होगे लाज, सरम, हया।
आतंकवाद के आगी म जर भुंजा जवइया अऊ लेसइया दूनो के न जात हे न धरम। त कवि कहिथे - कुचर दव ये आतंकवाद ल अइसन कुचरव के फेर कभू कोनो दिन कोनो गाँव, सहर, गली, मोहल्ला म मूड़ उठाये झन सकय। परकीरती चित्रण  म पौराणिक जी के कलम जादू जगा देथे -
बखरी के गोंदा हांस- हांस बिजराथे।
महर - महर दवना ह बड़ मटमटाथे।।
हमर कृषि संसकीरति वाला छत्तीसगढ़ बर सावन भादो के बढ़ महत्ता हे तभे त कवि गावत हे -
बरसत हे जलधार, असाढ़ के फुहार।
घुमरत हे करिया बादर बिजुरी चमकगे,
पानी झमाझम बरसगे नहावत हे रुख राई,
धरती के करे बर सिंगार,
परत हे असाड़ के फुहार।।
बियोग म बिरहा गीत कोनो नवा बात नोहय त देखव तो पौराणिक जी मयारु के सुरता करत हे, फेर ददा दाई भाई भौजी नदिया नरवा गाँव गिराम ल घलाव भुलाये नइहे। काबर के इही मन संग मयारु के दिन कटत हे त मयारु के दुख बिपत के संगी मन कवि मन ल परभावित तो करबे करही।
बरसत होही सावन मयारु तोर गाँव म।
बड़ी भुतही कस जूड़ हवा ह चलत होही।
नदिया अऊ नरवा म घार बोहावत होही,
हरियर दीखत होही खेत खार।
बारी म मोंगरा ममहावत होही, तोर फुलवारी,
बबा ह आल्हा गावत होही गुड़ी गाँव म।
बरसत होही सावन मयारु तोर गाँव म।।
ये कविता संगरह म हमर परम्परा, संसकीरती, माटी के  सोंध, गाँव गिराम के सहज सरल जीवन के झांकी बढ़ सुग्गर बरचित हे। इही सबो हर तो छत्तीसगढ़ी कविता के आधार आय। पौराणिक जी के कविता के जब्बर गुन वर्णनात्मक सैली अऊ चित्रात्मक आय। कोनो - कोनो मेर चिटिक धियान देहे बर परथे। बानगी देखव -
जउन ह संसो म पर जाथे
वो हर डरपोकना कहलाथे।
जउन के जघा म जेहर अऊ कहलाथे के जघा म कहाथे होतिस त कविता के सुघराई संग गुनवत्ता बाढ़ जातिस। उर्दू के मौसम, हमजोली असन शब्द के परयोग हर भासा के सुघराई बढ़ोये के काम करे हे।
पूरा संगरह ल पढ़ के जानेंव के पौराणिक जी के कविता उंकर तपसी मन में भभूत आय अऊ छत्तीसगढ़ी भासा ल संवारे सजाये साहित्य के दरबार म उंच पीढ़ा देवाय के उंकर साधना आय जेकर फल हम सबो पढ़ईया - लिखईया, सुनईया मन ल मिलही। इतिहास लिखाही त पौराणिक जी के पिरीत के पुरइन पान के बीच - बीच म कमल फूल दिखबे करही एमा दू मत नइ हे। सरसती दाई उंकर ऊपर किरपा बरसावत रहय अऊ छत्तीसगढ़िया पाठक मन ल सुग्घर कविता पढ़े मिलत रहय।
भिलाई दुर्ग छ.ग.

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