इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

बुधवार, 11 सितंबर 2013

मुझे तोड़ लेना वनमाली

नूतन प्रसाद
अब भारत को किसी के दरवाजे झांकने की आवश्य कता नहीं है.उसकी आथिर्क क्स्थति बेहद तगड़ी और सुÒढ़ है. एक दिन वह सोच  के समुद्र में डूब गया कि एफ.सी.आई. अनाज को और बैंक रूपयों को सम्हालने में असमथर् है तो बहते धन का यिा करूं ? उसका खाद बनवा दूं या फिर समुद्र में फिकवा दूं ? भारत को कुछ उपाय  नहीं सूझ रहा था कि उसकी अंतरात्मा ने ही कहा कि भूल गया उन देशभIों वीरों, विद्वानों को जिनकी बलिþ भुजाओं ने तुम्हें उÛति के शिखर पर फेंका. अरे, वे मखिी मच्छरों की तरह नहीं नाग की तरह इने - गिने तो है. भारत की चिंता हवा हो गई.उसने अपने लाड़लों की जेबों में पुरस्कार ठूंसना प्रारंभ कर दिया.
और य ह सत्य  भी है कि भारत के ये विशिý लाड़ले देश के प्रति इतने समपिर्त है कि इनके कर कमल पर पुरस्कार अपने आप समपिर्त हो जाते हैं.पुरस्कार को प्राÄ करने से पूवर् तक ये ध्वनि विस्तारक यंत्रों से घोषणा करते फिरते हैं कि हम तो नि: स्वाथर् सेवी है.हमें कुछ नहीं चाहिए मगर बांटने के वI जिÛ की तरह प्रकट होते हैं और पुरस्कार के साथ बलात्कार कर बैठते हैं.ये खिलखिलाते हुए दूसरों को हंसते हुए कैमरे का क्लिक दबवाते हैं पर इनके दांतों के दशर्न नहीं होते यिोंकि इनके दांत पेट में छिपे रहते हैं.
जिस किसी महानुभवों को पुरस्कार मिलने वाला होवह पहले लात लगाये पर बाद में उस पर अन्याक्रांति करे.अरे, इससे बड़ा नाम होता है.अखबार समाचार उगलते हैं कि अमुक कुमार ने पुरस्कार को जूते मार दिए थे. लेकिन उनके महान कमोY से आसI होकर पुरस्कार स्वयं आकर लिपट गया तो कोई करे यिा ? शरणागत को कोई दुत्कारता थोड़े ही है.इसके साथ ही अमुक कुमार पुरस्कार वितरण के वI कराटे का प्रदशर्न कर दें तो उनका य श कस्तूरी के गंध की तरह सवर्त्र फैल जायेगा.
उपरोI कमर्क·डों से पूवर् पुरस्कार रूपी चि ड़िया को फांसने के लिए पापड़ बेलने पड़ते है.जूते पालिश करने पड़ते हैं मगर खुले आम नहीं, पदेर् के पीछे.जो भी सƒन पुरस्कार हड़पने बेचैन है वे एप्रोच  के द्वारा प्राप्ति  य ज्ञ पूणर् कर लें.एप्रोच  को शाÍो में गाय  की संज्ञा दी गई है. उनकी पूंछ पकड़कर बैतरणी से पार लगाया जा सकता है.इसमें भी एक बात कि जिसकी पूछ पकड़ी गई है उसकी पूंछ मजबूत हो. ऊंची कुसीर् पर पदासीन हो वरना ऐसे बहेंगे कि जाल डालने पर भी लाश नहीं मिलेगी. समुद्र मंथन के वI देवता,क ल्पवृक्ष, उ‚ैश्रवा,कामधेनु, ऐरावत इसलिए उड़ सके यिोंकि उनका सीधा एप्रोच  विष्णु तक था.
अब मैं आपको उस स्थल की ओर घसीटना चाहूंता हूं जहां समारोह आयोजित था पुरस्कार वितरण के लिए.वैसे य ह देश समारोहों का देश के नाम से सारे संसार में विख्यात है समारोह करके ही आत्मप्रचार किया जाता है कि देखो, हमने उÛति कर ली. हम सक्षम नहीं होते तो समारोह कैसे करते ?हमारे य हां एशियाड हुआ अब ओलंपिक का आयोजन भी करेंगे. लोग भूख से तड़फ - तड़फ कर मर जाए. देश कजर् के मार से रोये चिंघाड़े कोई चि न्ता नहीं पर समारोह करेंगे. जश्न मनायेंगे. है कोई माई का लाल जो रोक कर दिखाए. और समारोह होते है जिनमें लाखो रूपयों की होली जलती है पर आयोजकों से खचेY के बारे में पूछा जाय  तो वे कातर स्वर में मिमियायेंगे कि हमारी हस्ती ही यिा है. समारोह बिलकुल सादा था.दरअसल ये ईमानदारी इसलिए बताते हैं कि इन्कमटैसि का फंदा उनका गला न कस सकें . धनी अगर कंगलू नाम रख लें तो उसके खाते जÄ नहीं होंगे कि हंूह, इसके नाम में ही दम नहीं तो दाम यिा खाक होगा ? लो, य हां भी आम आदमी आम की तरह चूस डाला गया.
समारोह स्थल को सजाने में रिजवर् बैंक के कितने कागज शहीद हुए इसे कैल्यिुलेटर भी नहीं बता सकता लेकिन य ह सत्य  है कि य ह स्थल दूसरे स्थानों की खि„ी उड़ा रहा था.निó„ी दि„ी देहातों के  पैसे से सजती है और देहातों से ही घृणा करती है.आखिर देहात शहरों के उपनिवेश है. मैं वहां आमंत्रित नहीं था पर खड़े होने लाय क जगह मिली य ह मेरे लिए गौरव की बात थी.नंगे को लंगोटी मिल जाए तो यिा कहना और पुरस्कार पाने का सवाल ही नहीं उठता यिोंकि योग्य ता सदा मेरी दुश्मन रही. मैं तो बस आबंटित होने आये समानों को ललचाई Òýि से देख रहा था जैसे भूखा होटल में रखी मिठाइयों को.
पुरस्कृत होने वालों में रामप्रकाश जैसे देशभI वीरभद्र जैसे वीर तथा अन्य  महान लोग थे.रामप्रकाश बंगालियों के प्रकाश दा महाराýि¬य नों के प्रकाश भाऊ छत्तीसगढ़ियों के परकास भइया थे. उनके हृदय  मेें देशभIि की इतनी हिलोरे उठती थी कि हाटर् अटैक होने का डर लगता था रामप्रकाश जैसे महापुरूष हमेशा पैदा थोड़े ही होते हैं. वो तो -
करती है फरियाद ये धरती कई हजारों साल ।
तब जाकर पैदा होता है एक जवाहर लाल ।।
तभी ध्वनि विस्तारक यंत्र ने उपक्स्थत जन समुदाय  के कानों में आवाज घुसेड़ी कि बाअदब, बाहोशियार, महान देशभI रामप्रकाश पुरस्कार को गौरवाक्न्वत करने पधार रहे हैं. लोग श्रद्धावनत् खड़े हो गये. मानों जन - गन - मन गाये जाने वाला हो.रामप्रकाश ने माइक के सामने जाकर मुंह को खोला - भाइयों एवं बहनों.. हें.. हें.. हें.. आपने मुझे महान देशभI कहा उसके लिए मैं आपका ऋणी हूं. मैं तो अपने को बस देशरूपी बगिया का फूल मानता हूं.मेरी इतनी ही अभिलाषा है -
मुझे तोड़ लेनार वनमाली,
उस पथ में देना तुम फेंक ।
मातृभूमि को शीश नवाने ,
जिस पथ जायें वीर अनेक ।
सच  कहूं - मुझमें पुरस्कार से अलंकृत होने की पात्रता बिल्कुल नहीं है मगर देश की वस्तु को अस्वीकार करता हूं तो देशवासी बिगड़ेंगे कि देश का अपमान कर दिया है. इसलिए अपनी स्वीकृति देता हूं.... ।
इधर रामप्रसाद भाषण झाड़ रहे थे, उधर पुरस्कार उनके हाथ का स्पशर् पाने तड़फ रहा था तो उसने ऊंची छलांग लगा ही दी. रामप्रसाद के अलंकृत होने से तालियां इतनी प्रसÛ हुई कि वे अपने आप बजने लगी. उस समय  आकाश बिलकुल साफ था पर कहां से पुष्प वृýि हुई, पता ही नहीं च ला.
अब वीरभद्र की बारी आयी. उन्होंने इहलोक पराÛं दुलर्भे को भी सुलभ करके देह बनायी थी. उनकी बलिþ भुजाएं बता रही थी कि वे ब्रम्हा·ड को गेंद की तरह फेंक देंगी. वे मुóे ऐसे मरोड़ रहे थे मानों दुश्मन का गला दबा रहे हो. सब तो ठीक था पर उनके नाम में भद्र शबद यिों आया य ही समझ से परे था. वे उठकर च ले तो पृथ्वी डगमगाने लगी और दिशाएं इधर से उधर भागती नजर आयी - डगमगानि महि दिग्गज डोले । लोग हांफते हुए आगे का Òष्य  देखने से मूंगफल्ली के बदले भय  खा रहे थे कि वीरभद्र ने पुरस्कार का शिकार वैसे ही कर लिया है जैसे शेर हिरण. वे पुरस्कार पकड़े चारों ओर घूमने लगे मानों कह रहा हो - इसका भक्षण तो अपने को ही करना था. शेर के शिकार का खून बकरी थोड़े ही पी सकती हैं.
इसी प्रकार महानपुरूषों ने पुरस्कारों पर डांके डाले. वे वापस होने लगे तो मैं बधाई देने उनके पास पहुंच  गया. मैंने रामप्रसाद से कहा - यिों साब, आपने देशभIि का पुरस्कार पाया. इसका अथर् य ही हुआ न कि आप ही देश के स‚े सेवक है और बांकी लोग देशद्रोही ? मैं पूछता हूं सीमा से सैनिक हट जाएं, कृषक - श्रमिक काम करने छोड़ दे तो आप अकेले देश को सम्हाल लेंगे ? रामप्रकाश  भड़के - य हां सब मेरे गुणगान कर रहे हैं और तुम अपमान करने उतारू हो. तुम्हारे साहित्य  में भी महाकवि राý¬कवि होते हैं तो यिा दूसरे कवि छोटे कवि या अराý¬ीय  हुए. अपना सुधार किया नहीं और कूद गया इंद्र की तरह हजार आंखें लेकर परदोष का दशर्न करने.
अपनी जाति पर बम बरसते देख मैंने रामप्रकाश से अड्डी ले ली.अगर भूले - भटके पुरस्कार मुझ पर दीवाना हो गया तो दूसरे लिखिाड़ मेरी च मड़ी उधेड़ लेंगे. मैं वीर भद्र की ओर मुड़ा. उनसे कहा - वास्तव में आप शेर है.
वीरभद्र प्रसÛ हुए.बोले - तुमने मुझे ठीक समझा. मैंने पुन: कहा - आप शेर हैं तो बाकी गाय , हिरण, और बकरी हैं जिनका खून पीकर आप हृý - पुष्ट हुए हैं. य ह भी ठीक होगा.
वीरभद्र ने दहाड़ लगायी - ऐ मिस्टर होश से बात करो.
मैंने कहा - मैं होश में हूं. बेहोश तो आप हैं जिन पर शIि का नशा च ढ़ा है. मैंने आपको कई बार दुलर्बों पर अत्याचार करते. बहू - बेटियों की इƒत लूटते देखा है. आप वीर नहीं काय र हैं. आपको काय रता का पुरस्कार मिलना चाहिए था.
वीरभद्र गुस्से से कांपने लगे मैंने सोचा उन्हें मलेरिया तो नहीं हो गया मगर नहीं वे मेरी ओर झपटे. इतने में एक अन्य  पुरस्कृत सƒन ने उन्हें रोका - अरे यार, छोड़ों भी. कहां लफंगे से भिड़ने च ले. कुत्ता कितना भी भूंके पर हाथी को बाजार जाना चाहिए.
और वे इठलाते - मच लते च ले गये. मैं गुबार देखता वहीं का वहीं खड़ा रहा.

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