इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

बुधवार, 4 सितंबर 2013

कविता है अनिवार्य

रामकुमार बेहार
बीसवीं सदी का हुआ अवसान
ढ़लती सदी ने
सिंहावलोकन किया
अपनी सदी का ।।
सच  है
कवियों के झुंड हुए
फिर भी
काव्य  प्रकाश हेतु
तरसती रही सदी ।।
कविता कामिनी ने
हषार्या कम, रूलाया है अधिक
दुनिया हो,
दीघर् और दिव्य
रहे सदा, दिखे सदा नबय  ।।
भारतीय  काव्य  - भूमि का
रहा है सुज्ञात इतिहास
वाल्मीकि से व्यास तक
तुलसी - सूर - कबीर तक
फैला काव्याकाश ।।
इस वितान में था
उमंग - तरंग - नवरंग
भIि व वीर रस से अतिरेक
काव्य  रचे गए अनेक ।।
भIि के लिए
शIि के लिए
अनुरIि चाहिए,
कविता है अनिवाय र्
सुन ले है आय र् ।।
कविता ने पारदशीर् कवच  बन
आततायी व आतर्वाणी को
सदैव है ललकारा
शासक के पास जब
बच ता था चारा
सहन शIि का च ढ़ता पारा ।।
कबीर से अद्यतन
क्रान्तिवाहक कवि
शासक द्वारा होता प्रताड़ित।।
कवि की तीसरी आँख
प्रतिभा कहलाती है
सवेर् भवन्तु सुखिन:
सवेर् सन्तु निरामया
होता उसका लक्ष्य
कभी न हुए वे पथभ्रý ।।
पुरा साहित्य  हुए नहीं नý
दुखी - दंडी लोगों का करते दूर कý
शताक्बदयाँँ बीत गई पर
शाश्वत प्रस्तुतियाँँ है अमर ।।
37, सुन्दर नगर, राय पुर (छ.ग.)
मोबाइल - 98266 - 56764

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें