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इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

बुधवार, 4 सितंबर 2013

कविता है अनिवार्य

रामकुमार बेहार
बीसवीं सदी का हुआ अवसान
ढ़लती सदी ने
सिंहावलोकन किया
अपनी सदी का ।।
सच  है
कवियों के झुंड हुए
फिर भी
काव्य  प्रकाश हेतु
तरसती रही सदी ।।
कविता कामिनी ने
हषार्या कम, रूलाया है अधिक
दुनिया हो,
दीघर् और दिव्य
रहे सदा, दिखे सदा नबय  ।।
भारतीय  काव्य  - भूमि का
रहा है सुज्ञात इतिहास
वाल्मीकि से व्यास तक
तुलसी - सूर - कबीर तक
फैला काव्याकाश ।।
इस वितान में था
उमंग - तरंग - नवरंग
भIि व वीर रस से अतिरेक
काव्य  रचे गए अनेक ।।
भIि के लिए
शIि के लिए
अनुरIि चाहिए,
कविता है अनिवाय र्
सुन ले है आय र् ।।
कविता ने पारदशीर् कवच  बन
आततायी व आतर्वाणी को
सदैव है ललकारा
शासक के पास जब
बच ता था चारा
सहन शIि का च ढ़ता पारा ।।
कबीर से अद्यतन
क्रान्तिवाहक कवि
शासक द्वारा होता प्रताड़ित।।
कवि की तीसरी आँख
प्रतिभा कहलाती है
सवेर् भवन्तु सुखिन:
सवेर् सन्तु निरामया
होता उसका लक्ष्य
कभी न हुए वे पथभ्रý ।।
पुरा साहित्य  हुए नहीं नý
दुखी - दंडी लोगों का करते दूर कý
शताक्बदयाँँ बीत गई पर
शाश्वत प्रस्तुतियाँँ है अमर ।।
37, सुन्दर नगर, राय पुर (छ.ग.)
मोबाइल - 98266 - 56764

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