इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

मो. कासिम खॉन '' तालिब '' की दो ग़ज़लें


1
मक्रो, फऱेब, झूठ से जो बाज़ रहा है।
वो शख़्स खुदा के लिए मुमताज रहा है।
हर शाम को मग़रिब से ये कहता है आफ़ताब,
कायम हमेशां कब किसी का नाज़ रहा है
ये  इश्‍क क्या बला है, ये होता है क्यॅू भला
मुद्दत हुई के आज भी इक राज रहा है
बरबादियों का जश्न मनाने वो आ गए
अपनों की दिल्लगी का क्या अंदाज रहा है
सुनते ही अपने कान का रु़ख फेरने वालों
' तालिब ' तुम्हारे दिल की भी आवाज रहा है
2
इक जाम तहे - दिल से पिला क्यूँ नहीं देते।
दीवानगी को हद से बढ़ा क्यूँ नहीं देते।
ईमान हो नशा तो इबादत हो मयकशी,
ऐसा भी कोई दीन चला क्यूँ नहीं देते
चाहत है अगर उनकी तो ये भी मुझे कुबूल
जख़्मों के गुलिस्तान खिला क्यूँ नहीं देते
कुछ तो ग़म - फिऱाक के गौहर समेट लूं
अश्‍कों के समंदर में डुबा क्यूँ नहीं देते
झूलों के  इंतजार में पेड़ों की शाख है
सावन की घटाओं को बता क्यूँ नहीं देते
झोंके हो हवा के जो अगर आप तो मैं भी
जलती हुई शम्‍़आ हूँ बुझा क्यों नहीे देते
लेना है अगर आप को ' तालिब ' का इम्तेहाँ
पर्दे को दर्मियाँ से उठा क्यूँ नहीं देते
पता
14, अमीरकम्‍पाउण्‍ड
बी एन पी रोड, देवास ( म.प्र.)
मोबाईल : 97540383864

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