इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

सम्‍पादकीय

संस्‍कारधानी राजनांदगांव की साहित्यिक जमीं को कोई नकार नहीं सकता। जो यह कहता है राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियां शून्‍य है उसे शायद यह नहीं मालूम की संस्‍कारधानी में आज भी साहित्‍य की वह धारा यथावत बह रही है जो डॉ पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी, डॉ बल्‍देव प्रसाद मिश्र, गजानन माधव मुक्तिबोध के समय बहती थी। मैं तो कहता हूं उन दिनों की अपेक्षा वर्तमान में साहित्यिक धारा कुछ अधिक ही वेग में बह रही है यही कारण है कि आज राजनांदगांव के  साहित्‍कारों के अनेक पुस्‍तकें छप कर आ रही है।

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