इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

सम्‍पादकीय

संस्‍कारधानी राजनांदगांव की साहित्यिक जमीं को कोई नकार नहीं सकता। जो यह कहता है राजनांदगांव में साहित्यिक गतिविधियां शून्‍य है उसे शायद यह नहीं मालूम की संस्‍कारधानी में आज भी साहित्‍य की वह धारा यथावत बह रही है जो डॉ पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी, डॉ बल्‍देव प्रसाद मिश्र, गजानन माधव मुक्तिबोध के समय बहती थी। मैं तो कहता हूं उन दिनों की अपेक्षा वर्तमान में साहित्यिक धारा कुछ अधिक ही वेग में बह रही है यही कारण है कि आज राजनांदगांव के  साहित्‍कारों के अनेक पुस्‍तकें छप कर आ रही है।

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