इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

अपना घर

- ज्योतिर्मयी पन्त -

नंदिनी आज अजीब ऊहापोह में थी। प्रिया उसे अपने साथ ले जाने की जिद पर अड़ी हुई थी। पिछले कई वर्षों से वह अपने मायके । यानी भाई के साथ रह रही थी। यहाँ वह बहुत खुश थी या अपनी मजबूरी से रहने आई थी ऐसी बात नहीं थी। एक तरह से नजरबंद कैदी सी हालत थी। पर करे तो क्या करे क्‍या ।  लाज निभानी ही थी। भैया ही उसे कौन अपनी ख़ुशी से लिवा लाये थे। भाई होने का फर्ज ही तो निभा रहे थे। मालूम तो था उन्हें कि उन्हें साथ ले आने से पत्नी भी नाराज होगी और उन पर जिम्मेदारी का बोझ भी बढेगा। । लेकिन उस समय के हालात में और कोई रास्ता भी नहीं था। नंदिनी के पति सुभाष का अचानक निधन हो गया था। अपनी कोई औलाद तो थी नहीं। भाई भतीजे भी अब अपनी मजबूरियों का आलाप करने लगे।
असल बात भी यही थी कि नंदिनी दो तीन बार माँ बनते -  बनते रह गई। हर बार तीन चार माँह में ही गर्भपात हो जाता। बड़े परिवार की जिम्मेदारियों को निभानें में व्यस्त पति न तो उनका  ध्यान रख पाया न इलाज कराने किसी अस्पताल ही ले जा पाया। घरेलू इलाज और वैद्यों और दाइयों के बताये रास्तों पर चलती गयी। बाद में डाक्टरों ने बता दिया कि वह अब माँ नहीं बन पायेगी।
सास ससुर के पास इस समस्या का आसान उपाय था ही। सुभाष का दूजा व्याह रच दिया जाय। नंदिनी या तो इसी घर में पड़ी रहे। खाने पीने की कमी तो थी नहीं या फिर मायके चली जाएगी। लेकिन सुभाष को ये बात ठीक न लगी। इसमें पत्नी का क्या दोष घर में इतने बच्चे हैं उन्ही से दिल जुड़ा लेंगे। पर माँ पिता जी न माने। कहते ' अरे !अभी ये कहना आसान है। बाद में सब अपने - अपने बच्चों को लेकर इधर - उधर रहने लगेंगे। अपना खून अपना ही होता है। बुढ़ापे का सहारा तो अपनी ही संतान होगी न ? कई वर्षों की जिद्दोज़हद और मान - मनौवल के बाद तय हुआ कि वे बच्चा गोद ले लेंगे।
नंदिनी की दूर के रिश्ते की चचेरी बहन कई लड़कियों को जन्म देने की सजा भुगत रही थी। इस बार भी पता चला था कि गर्भ में न्या भ्रूण ही पल रहा है और उसे मार गिराने की कोशिशें चल रही हैं। इसीलिए वे शहर आये थे और नंदिनी से मिलने पर उसे ये बात पता चली थी। उधर डाक्टरों ने गर्भ गिराने से मना कर दिया। देरी हो चुकी थी माँ की जान को भी खतरा हो सकता है, चचेरी बहन का कहना था कि जान जाने का खतरा इतना नहीं जितना परिवार की प्रताडऩा और अवहेलना का । तीन बेटियाँ हैं और चौथी अगर पैदा हुई भी तो जी न पायेगी। उसकी दुखभरी व्यथा - कथा में सुभाष और नंदिनी को एक किरण दिखाई दी। तभी तय हुआ था कि नंदिनी की चचेरी बहन हिमानी की संतान को नंदिनी और सुभाष गोद ले लेंगे। इस बात के लिए दोनों घरों में कई - कई दिनों तक विचार विमर्श भी चलते रहे। जब तक काम संपन्न न हो कुछ कहा भी तो नहीं जा सकता था। अगर हिमानी ही बाद में मना कर दे तो ?  हिमानी के घरवाले या खुद सुभाष और नंदिनी के घर के लोग तो ,खैर।
अब सिर्फ  प्रतीक्षा ही कर सकते थे। समय आने पर बात बन गयी। हिमानी अश्रुपूरित नयनों से नन्हीं सी बेटी को नंदिनी की गोद में डाल गयी । अन्य बेटियों की तुलना में कम से कम एक को तो हर समय बेटी के रूप में जन्म लेने का अहसास बार बार नहीं कराया जायेगा। और इसे तो अपने से दूर करवाने का सोचकर ही वह यहाँ आई थी। अब वह जीवित रह सकेगी। उसके घर में अगर बेटी का इतना मान होता तो क्या मरवाने भेजते। चलो इस पाप कर्म से मुक्ति तो मिली नंदिनी की सहायता से।
नन्हीं प्रिया के आने से नंदिनी की दुनिया ही बदल गयी थी । कई वर्षों के बाद नंदिनी और सुभाष ने प्रिया प्रिया सारी सच्चाई बता भी दी थी। कोई बाहर के लोग बताएँ और बिटिया को दु:ख पहुँचे ,ऐसा वे कतई नहीं चाहते थे। हिमानी से भी उसे मिलाया और बहनों से भी। दोनों ही परिवार आपस के इस रिश्ते को निभा रहे थे।
प्रिया को दोनों ही घरों में स्नेह मिलता। सभी कुछ तो ठीक ही चल रहा था। पर घर के अन्य सदस्य जब प्रिया की खुशियों भरी जिंदगी देखते तो उन्हें यह सहन नहीं होता। वे चाहते क्या नंदिनी उनकी संतान को नहीं अपना सकती थी ? कभी कभी वे प्रिया को भी ये जाता देते कि वह इस घर की बेटी नहीं है। कभी कभी नंदिनी को भी उकसा देते पराई संतान तो पराई ही होती है उस पर भी ये तो लड़की है उसे तो ससुराल जाना ही होगा शादी के बाद। । यहीं तो नहीं रहेगी न। कभी अपने घर ही लौट जाये तो भविष्य किसने देखा है चलो जो भी हो ।
सुभाष के रहते उससे कभी किसी ने कुछ न कहा। नंदिनी को भी सुभाष दूसरों की बात पर ध्यान न देने को कहता। उसे समझाता , तुम्हें अपने काम से मतलब रखना चाहिए। लोग तो ऐसे ही कुछ न कुछ कहते ही रहेंगे।
प्रिया पढऩे लिखने में बहुत होशियार थी और व्यवहार में भी बहुत अच्छी थी। अभी वह बारहवीं कक्षा में थी और उसकी  इच्छा थी कि वह इंजीनियर बने। पर सुभाष के अचानक स्वर्ग सिधार जाने से घर और उसमें रहने वाले लोगों की जिंदगी में तूफान सा आ गया। प्रिया को तो नंदिनी और सुभाष ने ख़ुशी से अपना लिया था। मानवीय संबंधों के आधार पर वह उनकी हो गयी थी पर उन्हने कोई कागजी कार्यवाही नहीं की थी अर्थात उसे कानूनी तौर पर गोद नहीं लिया गया था। परिवार के लोग चाहते भी नहीं थे कि घर में उसकी हिस्सेदारी भी हो। यहाँ तक तो ठीक मान भी लिया जाता पर हद तब हो गई जब वे नंदिनी को भी सहारा देने में आनाकानी करने लगे। जब कि घर और जमीन में सुभाष का भी हिस्सा था और वह अच्छा बैंक बैलेंस भी छोड़ गया था। बेटी को इंजीनियर बनाने की चाहत थी उसकी शादी के सपने संजोये थे।
सुभाष के चले जाने के बाद दो तीन महीने ही मुश्किल से बीते थे कि घर की हालत दिन पर दिन खराब होती गई। रोज ही किसी न किसी बात पर तनाव,कहा सुनी,मनमुटाव बढऩे लगे। इसी बीच नंदिनी के भाई राकेश अपनी बहन से मिलने आये थे। सारी बातें जानने के बाद उन्हें लगा कि बहन को साथ ले जाना ठीक होगा। यहाँ तो उसका जीना मुश्किल हो रहा है। पर प्रिया का क्या करें एक तो उसका कॉलेज में फाइनल वर्ष है और उसको भी साथ ले जाने का अर्थ है अपने ऊपर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ाना कई साल पहले उसने भी तो नंदिनी को कहा था कि उसी का बच्चा गोद ले लेती।
नंदिनी जाना ही नहीं चाहती थी। जैसा भी हो यही तो उसका घर है। यहीं तो डोली में आई थी और अब अर्थी में ही यहाँ से जाना चाहिए न प्रिया को छोड़कर वह रह भी नहीं पाएगी क्या यही प्रेम और वात्सल्य है जब खुद को जरुरत थी तो अपना लिया अब किसी मजबूरी में छोडऩे की । बात यानि कि अपनी बेटी और अपनी बेटी जैसी में। इतना फर्क  कर देना स्वार्थ की परिकाष्ठा होगी। वह बहुत दुखी थी। तभी प्रिया ने ही माँ को समझाया वह परीक्षा तक घर पर रह लेगी। बाद में उसे किसी होस्टल में प्रवेश दिला देना बस कुछ ही साल गुजारने पड़ेंगे फिर उन्हें कोई दूर नहीं कर सकेगा ।
इसी बीच हिमानी भी मिलने आई। उसने नंदिनी से कहा कि वह चिंता न करे अगर उचित लगे तो प्रिया को लेकर वह उसके घर चले। प्रिया के स्वावलंबी बनने तक पर नंदिनी उसका प्रस्ताव न मान सकी। इससे उसके अपने घर और भाई की इज्जत पर लोग ऊँगली उठाते। पर ये बात तय हो गयी कि प्रिया की चिंता कम हो गयी अब वह अपने घर में या माँ के घर में रह सकती थी। बाद में होस्टल या जो भी हो । 
नंदिनी अपने भाई के घर पहुँच गयी। कुछ दिन बड़ा आराम मिला,आव भगत भी हुई। लेकिन धीरे धीरे स्नेह के स्रोत रीतने से लगे। भाभी भी रूखा व्यवहार करने लगी। अनचाहा बोझ पड़ गया था। नंदिनी को महसूस होने लगा कि मायका माँ पिता के साथ ही होता है । अब यह घर भी उसके लिए पराया ही है। लेकिन करे तो क्या करे ? जाये तो कहाँ जाये ? सारा जीवन एक यात्रा जैसा ही है सभी घर । जिसे अपना समझ के रहने योग्य बनाने के प्रयास में एक स्त्री की जिंदगी बीत जाती है वह अपना होता ही नहीं।  पिता का घर ,पति का घर भाई का घर या बेटे का घर। पर अपना नहीं। शायद इसी कारण आज वह भाई के घर पर है। यहाँ दिन भर घर के कामों में सहायता करती है पति की पेंशन भी उनके हाथों सौंप देती है। जिन्दगी जीने का अंदाज ही बदल गया अब दिनों की गिनती ही सबसे बड़ा काम है। आज बीता अब कल फिर कल। कभी बीमार भी होती तो चुप लगा लेती। भाभी सोचती बहाना है बस।
अवसाद के क्षणों में उसे पुरानी बातें याद आती काश बेटा होता तो ये दिन न देखने पड़ते। प्रिया का सहारा भी नहीं है। पता नहीं पढाई पूरी करने के बाद क्या होगा। उसके सपने पूरे करने की जिम्मेदारी मेरी थी पर मैं ही क्यों कमजोर पड़ गयी। अपने हक के लिए तो मुझे प्रयास करना चाहिए था क्यों दोनों के जीवन को दाँव पे लगा दिया,और अब क्या कर सकती है ? भाई के बच्चे कभी कभार बात कर लेते तो ख़ुशी से निहाल हो जाती वर्ना तो भीड़ में भी अकेली सी मायूस रहती।
इस बीच प्रिया इंजीनियर का कोर्स कर चुकी थी और अब नौकरी की तलाश में थी। एक दो बार आरम्भ में मिलने आई थी तो किसी ने ख़ुशी जाहिर नहीं कि बल्कि कुछ न कुछ तानें देकर दोनों का दिल दुखाया था नंदिनी ने तब उसे आने से मनाकर दिया था।
अब आज नंदिनी आई थी। जिद पर अड़ी थी कि अब कुछ कहना सुनना नहीं। बस साथ चलना है। अगर कपड़े लत्ते समेटने हैं तो ठीक वर्ना उसकी भी आवश्यकता नहीं । उसे बेंगलुरु में बहुत अच्छी नौकरी मिल गई है बड़ी कंपनी में घर भी मिला है । उसे पढाई के लिए स्‍कालरशिप मिलती रही अत: सुभाष ने जो पैसे उसकी पढाई और शादी के लिए रखे थे वे सुरक्षित हैं। उससे अब वे एक घर खरीद सकते हैं। कम्पनी और बैंक से लोन मिल सकता है। अब नंदिनी की पसंद से वे एक फ़्लैट खरीद लेंगे। अब चिंता और दु:ख भरे दिन बीत गए माँ। अब तुम अपने घर में रहोगी अपनी बेटी के साथ। आज शाम को ही चलना होगा। नंदिनी उसको आश्चर्य से अपलक निहारती रह गई। सोचने लगी खुद के लिए न सही पर प्रिया के भविष्य और उसकी इस आत्मनिर्भर रहने की सोच का साथ उसे देना ही चाहिए। वह उसकी तरह किसी सहारे की मोहताज नहीं थी।
नंदिनी दुविधा में पड़ गयी क्या जाना ठीक होगा। बात सभी के सामने हो रही थी नंदिनी को फिर भी उम्मीद थी कि भाई भाभी उसे रोकेंगे और यहीं रहने का आग्रह करेंगे। लेकिन एक चुप्पी सी छाई हुई थी सुबह प्रिया के आने से सभी असमंजस में थे । पर अब भाभी के चेहरे पर एक चमक सी दिखाई दी। बड़ी बेटी डौली से बोली - अरे। । बैठी क्या है। प्रिया के लिए चाय तो ले आए, फिर जल्दी से खाना बनाना है प्रिया अपनी माँ को लेने आई है। आज नंदिनी बुआ अपनी बेटी के साथ जा रही हैं। नंदिनी जैसे मूर्छा से जागी। हाँ भाभी! ठीक कहा आपने। मैं भी तैयार हो जाऊँ।। समय बहुत कम है, कह कर उठ गई
लगभग दो घंटे में नंदिनी तैयार हो गई । उसे सुभाष की बहुत याद आ रही थी। कितना भरोसा था उन्हें अपनी परवरिश पर और बेटी पर । तीसरे दिन नंदिनी अपनी बेटी के साथ उसकी कंपनी वाले घर पहुँच गई थी शाम को प्रिया उसे फ़्लैट दिखाने ले गई ।  उसे वह पसंद आ गया कुछ ही दिनों में रहने के लिए तैयार हो जायेगा दोनों माँ बेटी कितने वर्षों की बातें याद कर रही थी आज प्रिया को अपनी माँ और नंदिनी को बेटी और अपना घर मिल गया था सपनों में बसे अपने घर की कल्पना में वह खो सी गई।

पता - ए 45, रीजेंसी पार्क 1, डी एल एफ फेस 4,
गुडगाँव हरियाणा- 112002

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें