इस अंक में :

मनोज मोक्षेन्‍द्र का आलेख '' सार्थक व्यंग्य के आवश्यक है व्यंग्यात्मक कटाक्षों की सर्वत्रता '', डॉ. माणिक विश्‍वकर्मा '' नवरंग '' का शोध लेख '' हिन्दी गज़ल का इतिहास एवं छंद विधान: हिन्दी की'',रविन्‍द्र नाथ टैगोर की कहानी '' सीमांत '', मनोहर श्‍याम जोशी की कहानी '' उसका बिस्‍तर '', कहानी ( अनुवाद उडि़या से हिन्दी)'' अनसुलझी''मूल लेखिका:सरोजनी साहू अनुवाद:दिनेश कुमार शास्त्री, छत्तीसगढ़ी कहिनी'' फोंक - फोंक ल काटे म नई बने बात'' लेखक:ललित साहू' जख्मी', बाल कहानी '' अनोखी तरकीब''''मेंढक और गिलहरी'' रचनाकार पराग ज्ञान देव चौधरी,सुशील यादव का व्यंग्य '' मन रे तू काहे न धीर धरे'', त्रिभुवन पांडेय का व्‍यंग्‍य ''ललित निबंध होली पर'',गीत- गजल- कविता: रचनाकार :खुर्शीद अनवर' खुर्शीद',श्याम'अंकुर',महेश कटारे'सुगम',जितेन्द्र'सुकुमार',विवेक चतुर्वेदी,सुशील यादव, संत कवि पवन दीवान,रोज़लीन,डॉ. जीवन यदु, टीकेश्वर सिन्हा'गब्दीवाला, बृजभूषण चतुर्वेदी 'बृजेश', पुस्तक समीक्षा:'' इतिहास बोध से वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार'' समीक्षा : एम. एम. चन्द्रा'', ''मौन मंथन: एक समीक्षा''समीक्षा''मंगत रवीन्द्र,''जल की धारा बहती रहे''समीक्षा : डॉ. अखिलेश कुमार'शंखधर'

बुधवार, 27 नवंबर 2013

सीला बरहिन

- सत्यभामा आडि़ल -

सीला गांव ले आय रिहिस। त सब ओला सीला बरहिन कहाय। अपन बूढ़त काल के एक बेटा ल घी - गुड़ खवावय त देवर बेटा मन ल चाऊर पिसान ल सक्कर म कहि के पानी मं घोर देवंय। देवरानी जल्दी खतम होगे देवर तो पहिलिच खतम होगे रिहिस। नान - नान लईका  देवर के फेर सीला बरहिन के बेटा ह सबले छोटे रिहिस।
देवर के बड़े दूनों बेटा मास्टर होगें मेट्रिक पढ़े के बाद। सीला बरहिन अपन बेटा ल देवर बेटा घर पहुंचईस पढ़े बर। हर आठ दिन मं घी, चाऊंर ले के आवय। सांझ होवत चल दय। रंग - रंग के खाय - पिए के कलेवा बना के लानय। अपने बेटा ल बईठार के खवावय - पिलावय अऊ चल दय। दू झन देवर बेटा मन छोट  रहिन। फेर ओ मन ल तीर मं नई ओधन दय। घर के सियान ए, बड़े दाई के हुकुम चलय दूनों बड़े देवर बेटा के बिहाव करिस त बहूमन के दाईज - डोर के गाहना - गुरिया ल तिजोरी मं भर के राखे रहाय। देवर बेटा मन नई बोले संकय, न पूछे सकय। बहू मन के बोले तो बातेच दूरिहा हे।
दिन बीतस गिस। दूनों छोटे देवर बेटा मन अऊ सीला बरहिन के बेटा ह मेट्रिक पढ़ के निकलिस तहां ले खेती के काम देखे लगिस। बड़े देवर बेटा कोसिस करके सीला बरहिन के बेटा ल घलो मास्टरी मं लगा दिस। काम
बिहाव होईस तीनों झन के। तहां ले सीला बरहिन बंटवारा कराय बर पंचमन के बईठक बलईस। ओखर बहू के गहना - गुरिया जादा नई आय रहिस। देवर बेटा मन के बिहाव म चारों बहू के गाहना - गुरिया मं तिजोरी भर गे। सीला बहरिन के खोट नियत मं सबो गाहना दू भाग मं बांटिस। पंचमन करा सबो जायदाद अउ गाहना बरतन ल दू भाग मं बंटवईस। एक बांटा में चार देवर बेटा, दूसर बांटा मं ओखर एक बेटा। चारों देवर - बेटा बहू मन के गाहना - गुरिया बंटागे। धार - मार के रोईन बहू मन। बड़े - बड़े घर के बेटी दू - दू तीन - तीन परत के गाहना - गुरिया आय रहिस कदराही झुमका, चारों झन के। सीला बरहिन अपन डाहर ले लिस। काहीं नई बोलिन देवर बेटा मन। अपन - अपन घरवाली के मुंह बंद कर के राखिन ओमन। होगे बंटवारा। खंडग़े अंगना। ए पार चार भाई, ओ पार एक भाई।
चार भाई के बेटा - बेटी होईन। पढ़ - लिख के कालेज पहुंचिन। चारों के चार बेटा इंजीनियर बनगे। बेटी मन घलो कॉलेज पढ़के , घर बसईन। पढ़े - लिखे नौकरिहा दमाद मिलिस। सबो झन खुसी - खुसी अपन दिन बितईन। सहर मं रिहिन। गांव मं तीसरा नंबर के बेटा भर रिहिस।
सीला बरहिन के बेटा गांव के स्‍कूल मं मास्टर रहिस। एक झन के छह बेटी - बेटा होगे। पालत - पोसत, पढ़ावत - लिखावत थकगे सीला बरहिन के बेटा ह। चार बेटा मन ले दे के मेट्रिक पास होईन। बेटी मन के घलो तीर - तखार के गांव मं बिहाव होईस। सीला बरहिन छहों नाती - पोता देख के मरिस। ओखर बांटा मं मिले सबो जेवरात - गाहना गुरिया सीरागे,खेती कमतियागे, आधा खेत मन बेचागे।
दू झन बेटा बिमरिहा होगे। तीसर बेटा खटिया धर लिस। एक झन बेटी खाली हाथ होगे। दूसरे बेटी निरबंसी होगे। गांव वाले मन देखयं अउ लीला चौरा मं बईठ के बतियावंय- देखव, का होथे दुनिया मं। ऊपर वाला ह नियाव करथे। सीला बरहिन अब्बड़ तपिस अपन देवर बेटा मन बर। ओखर देवर बेटा मनए गरीब - गुजारा खा - पी के, सादा - सरबदा रहि के पढ़ - लिख लीन। अऊ सीला बरहिन के बेटा ह बने खात - पियत घलो बिमरहा होगे। नाती - पोता मन तो अउ गय। मनखे के करम के सजा भगवान ह लईका  मन ल देथे। दुनिया में इही देखथन। करम - करय कोनो, अउ सजा भुगतय बंस मन। वाह! भगवान! कईसन नियाव करथस। मनखे मन,सब देखके घलो नई सीखय। बने करम के बने फल मिलथे। 

पता 
शंकरनगर, रायपुर , ( छ .ग.)

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