इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : शेषनाथ प्रसाद का आलेख :मुक्तिबोध और उनकी कविताओं का काव्‍यतत्‍व, डॉ. गिरीश काशिद का शोध लेख '' दलित चेतना के कथाकार : विपिन बिहारी, डॉ. गोविंद गुंडप्‍पा शिवशिटृे का शोध लेख '' स्‍त्री होने की व्‍यथा ' गुडि़या - भीतर - गुडि़या ', शोधार्थी आशाराम साहू का शोध लेख '' भारतीय रंगमंच में प्रसाद के नाटकों का योगदान '' हरिभटनागर की कहानी '' बदबू '', गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी '' क्‍लॅड ईथरली '' अंजना वर्मा की कहानी '' यहां - वहां, हर कहीं '' शंकर पुणतांबेकर की कहानी '' चित्र '' धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' मंतर '' अटल बिहारी बाजपेयी की गीत '' कवि, आज सुनाओ वह गान रे '' हरिवंश राय बच्‍चन की रचना ,ईश्‍वर कुमार की छत्‍तीसगढ़ी गीत '' मोला सुनता अउ सुमत ले '' मिलना मलरिहा के छत्‍तीसगढ़ी गीत '' छत्‍तीसगढ़ी लदका गे रे '' रोजलीन की कविता '' वह सुबह कब होगी '' संतोष श्रीवास्‍तव ' सम ' की कविता '' दो चिडि़यां ''

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

जिन्दगी एक कशिश

- डॉ. मणी मनेश्वर साहू '  ध्येय '  -
जिन्दगी एक कशिश है
है जीने की, एक तमन्ना
उद्धेलित भावनाएं
सिमटी - सी बैठी
दिल के एक कोने में
फिर अरमानों के उजालों में
रौशनी भरी
अचानक जगमगा उठी है - जिन्दगी
खुला आकाश
बहुत कुछ पाने की एक चाह लिये
परन्तु ... फिर ये क्या ?
सहमी - सी
फीकी पड़ी, मुरझा गई।
जरा सोच,
बैर को भगाना, बैर से बचना, बचाना
हाँ, यही तो है
सावधानी हमारी आपकी
जिन्दगी की।

पता 
पिताम्बर कुंज, गीतांजली चौक
नवागाँव खिसोरा, पो. - धौराभाठा
व्हाया - पाण्डुका, जिला - धमतरी ( छ.ग.)

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