इस अंक में :

डॉ. रवीन्‍द्र अग्निहोत्री का आलेख '' हिन्‍दी एक उपेक्षित क्षेत्र '' प्रेमचंद का आलेख '' साम्‍प्रदायिकता एवं संस्‍कृति '' भीष्‍म साहनी की कहानी '' झूमर '' सत्‍यनारायण पटेल की कहानी '' पनही '' अर्जुन प्रसाद की कहानी '' तलाक '' जयंत साहू की छत्‍तीसगढ़ी कहानी '' परसार '' गिरीश पंकज का व्‍यंग्‍य '' भ्रष्‍ट्राचार के खिलाफ अपुन '' कुबेर का व्‍यंग्‍य '' नो अपील, नो वकील, घोषणापत्र '' गीत गजल कविता

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

आजादी की नई रोशनी


- डॉ. गार्गीशरण मिश्र '  मराल ' -

आज़ादी की नई रोशनी दिखा रही है दुनिया काली।
आज सिनेमा के स्वर में ही
गाती है हर एक अटारी,
आँख लगाना नहीं किसी से
मर जाना तुम मार कटारी।
सुन सुनकर संगीत मरण का जीती है जनता मतवाली।
नर का चरम विकास रह गया
खाना पीना मौज उड़ाना,
नारी के विकास की सीमा
नंदन की तितली बन जाना,
विद्युत के दीपों दिखती नवभारत की ज्योति निराली।
सत्य अहिंसा के मंदिर का
भूल रही है पथ आज़ादी,
खाकी के धागे से लटका
झूल रहा है गाँधीवादी,
मूल रही है सूख विटप की फूल रही है डाली - डाली।
आजादी की चमक कि  जिसमें
राम कृष्ण खो गये हमारे,
नानक, बुद्ध, मुहम्मद, ईसा
महावीर हैं हमसे न्यारे,
दिव्य ज्योतियाँ निगल विश्व में रात चली करने उजियाली।
पता 
1436 /बी सरस्वती कॉलोनी, 
चेरीताल वार्ड, जबलपुर - 482002  ( म.प्र.)

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