इस अंक में :

इस अंक में पढ़े : ( आलेख )तनवीर का रंग संसार :महावीर अग्रवाल,( आलेख )सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै : प्रो. अश्विनी केशरवानी, ( आलेख )छत्‍तीसगढ़ी हाना – भांजरा : सूक्ष्‍म भेद- संजीव तिवारी,( आलेख )लील न जाए निशाचरी अवसान : डॉ्. दीपक आचार्य,( कहानी )दिल्‍ली में छत्‍तीसगढ़ : कैलाश बनवासी ,( कहानी )खुले पंजोंवाली चील : बलराम अग्रवाल,( कहानी ) खिड़की : चन्‍द्रमोहन प्रधान,( कहानी ) गोरखधंधा :हरीश कुमार अमित,( व्‍यंग्‍य )फलना जगह के डी.एम: कुंदन कुमार ( व्‍यंग्‍य )हर शाख पे उल्लू बैठा है, अन्जामे - गुलिश्ता क्या होगा ?: रवीन्‍द्र प्रभात, (छत्‍तीसगढ़ी कहानी) गुरुददा : ललितदास मानिकपुरी, लघुकथाएं, कविताएं..... ''

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

साक्षात रूप को


- डॉ. रामशंकर चंचल -
धनी जुल्‍फ़ोंके
बीच
झांकते
बेहद खुशनुमा
रंगीन
सुकोमल / नाजुक
मन को छु लेने वाले
अजीब कसक भरे
चेहरे को
मैंने कई बार
तस्वीरों में देखा
याद है
मैं तब उसे
अकसर
निहारता / उससे
बाते करता
सोचता
सचमुच यह चेहरा
दुनिया में है भी
या किसी कलाकार की
कल्पना है
पर आज जब
तुम्हारी कज़रारी
रेशमी घनी जुल्‍फ़ों के
बीच तुम्हारा
चेहरा देखा तो
देखता रह गया
मन नहीं माना
मैंने उसे अपनी
आँखों के साथ
अपने कैमरे में भी
कैद कर लिया
और मन ही मन
नमन करता रहा
उस ईश्वर को
जिसने कितनी
अद्वितीय कृति का
निर्माण किया
तुम्हारे रुप में
जो चाह रहा था
मैं
अपने दोनों हाथों में
थाम लूं
ईश्वर के इस
साक्षात रुप को।

पता 
माँ, 145, गोपाल कालोनी
झाबुआ - 457661 ( म.प्र.)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें